गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

= ७९ =

卐 सत्यराम सा 卐
जानै बूझै साच है, सबको देखन धाइ ।
चाल नहीं संसार की, दादू गह्या न जाइ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! संसारीजन सत्यस्वरूप ब्रह्म का सभी साक्षात्कार करना चाहते हैं, किन्तु लोकाँचार के बन्धनों से साधारण जन सत्य - स्वरूप का निश्‍चय नहीं कर सकते हैं । और फिर संसारीजन निष्पक्ष ब्रह्मवेत्ता संतों को धन्य मानते हैं । उनके दर्शनों के लिये देश - देशान्तर में जाते हैं । परन्तु संसार की चाल, कहिए मत - मतान्तरों के बाह्य - चिन्ह नहीं होने से संतों का मध्य मार्ग, संसारीजनों से नहीं धारण किया जाता है ॥ 

दादू पख काहू के ना मिले, निर्पख निर्मल नांव ।
सांई सौं सन्मुख सदा, मुक्ता सब ही ठांव ॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सच्चे ब्रह्मवेत्ता संत, हिन्दू - मुसलमान आदि किसी भी साम्प्रदायिक धर्म में नहीं मिलते हैं, वे सर्व मतों से निष्पक्ष समताभाव को धारण करके भगवान् के निष्काम नामों का स्मरण अखंड भाव से करते हुए केवल प्रभु में ही वृत्ति लगाकर रहते हैं और लोक - कल्याण के लिये सारी वसुधा पर विचरते और उपदेश करते रहते हैं ॥ 
(श्री दादूवाणी ~ मध्य का अंग)
चित्र सौजन्य ~ Chetna Kanchan Bhagat

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