卐 सत्यराम सा 卐
दादू माया सौं मन बिगड़या, ज्यों कांजी करि दुग्ध ।
है कोई संसार में, मन करि देवे शुद्ध ॥
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साभार ~ Girdhari Agarwal
**आध्यात्मिक शिक्षाप्रद कथा**
**पराया हक**
दूसरों का हक हमारे पास न आये - इस विषय में मनुष्य को खूब सावधान रहना है | अपनी खरी कमाई का अन्न खाओगे तो अन्तःकरण निर्मल होगा और अगर चोरी का ठगी-धोखेबाजी का, अन्याय का अन्न खाओगे तो अन्तःकरण महान अशुद्ध हो जायगा |
आज कल टैक्स बहुत बढ़ जाने से लोग व्यापार आदि में चोरी-छिपाव करते हैं | जैसे-जैसे वकील सिखाता है, वैसा-वैसा करके वे धन बचाने की चेष्टा करते हैं | वे विचार ही नहीं करते कि इस प्रकार धन बचाने से अन्तःकरण कितना मैला हो जायगा !
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एक संत कहा करते थे कि शुद्ध कमाई के धन से बहुत पवित्रता आती है | उनके पास एक राजा आया करते थे | एक बार राजा ने उनसे पूछा कि 'महाराज, आपके यहाँ बहुत-से लोग आया करते हैं और आप भी कई लोगों के घरों में भिक्षा के लिये जाया करते हैं | ऐसा कोई घर आपकी दृष्टि में है, जिसका अन्न शुद्ध कमाई का हो ?' अगर ऐसा घर आपको दीखता है तो बतायें |' संत ने कहा कि 'अमुक स्थान पर एक बूढ़ी माई रहती है, उसके घर का अन्न शुद्ध है | वह ऊन को कातकर उससे अपनी जीविका चलाती है | उसके पास धन नही है, साधारण घास-फूस की कुटिया है; परन्तु वह पराया हक नहीं लेती, इस कारण उसका अन्न शुद्ध है |' ऐसा सुनकर राजा के मन में आया कि उसके घर की रोटी मिल जाय तो बड़ा अच्छा है !
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राजा स्वयं एक भिखारी बनकर उससे घर पहुँचा और बोला-'माताजी ! कुछ भिक्षा मिल जाय |' वह बूढ़ी माई भीतर से रोटी लायी और बोली - 'बेटा ! यह रोटी ले लो |' तब राजा ने पूछा -'माताजी, एक बात बताओ कि यह रोटी शुद्ध है न ? इसमें पराया हक तो नहीं है ?' तो वह बोली - 'देख बेटा, बात यह है की यह पूरी शुद्ध नहीं है, इसमें थोड़ा पराया हक आ गया ! एक दिन रात में बारात जा रही थी | बारात में जो गैस-बत्तियाँ थीं, उनके प्रकाश में मैंने ऊन ठीक की थी - इतना इसमें पराया हक आ गया है | इसके सिवाय मेरी कमाई में कोई कसर नहीं है |'
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राजा ने बड़ा आश्चर्य किया कि इतनी - सी कमी का भी इतना खयाल है ! दूसरे के उस प्रकाश में हमारा क्या अधिकार है कि उसमें हम अपनी ऊन ठीक करें ?

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