🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*(ग्रन्थ ४) सुख समाधि*
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*जैसैं नदी समुद्र समावै,*
*द्वैत भाव तजि ह्वै जलरास ।*
*घी सौ घौंटि रह्यौ घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवै सुन्दरदास ॥२७॥*
जैसे नदी अपना द्वैतभाव छोड़कर एक दिन समुद्र में जा मिलती है और एक जलराशि के रूप में अवस्थित हो जाती है, अपनी वही स्थिति हमने समाधि द्वारा परमात्मा के साथ बना ली है, और उसी का आनन्द ले रहे हैं ॥२७॥
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*रजु मैं सर्प सीप में रूपो,*
*मृग तृष्णा जल ज्यौं आभास ।*
*घी सौ घौंटि रह्यौ घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवै सुन्दरदास ॥२८॥*
अब हमें ठीक पता लग गया है कि जैसे रज्जु में सर्प का तथा सीप में मोती का एवं मृगमरीचिका में जल का आभास होता है पर वस्तुतः वह है नहीं; इसी तरह आत्मा में देह के गुण आभासित होते हैं, वस्तुतः आत्मा उन गुणों से निर्लिप्त है । इस ज्ञान के उदय के बाद यदि हम निर्विकल्प समाधि में ही आनन्द मान रहे हैं--यह उचित ही है ॥२८॥
(क्रमशः)

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