सोमवार, 24 अप्रैल 2017

= मन का अंग =(१०/७३-५)


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*मन का अँग १०*
.
*मन प्रबोध*
*कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम ।*
*विषयों का संग छोड़ दे, दादू कह रे राम ॥७३॥*
७३ - ७४ में मन को उपदेश कर रहे हैं - रे पापी मन ! साँसारिक कामनाओं का त्याग कर, विषयासक्ति छोड़ फिर निरँतर निरंजन राम का चिन्तन कर, यह हमारा कहना मान ले ।
*केता कह समझाइया, माने नहीं निलज्ज ।*
*मूरख मन समझे नहीं, कीये काज अकज्ज ॥७४॥*
इस मन को अनेकों बार कह - कह कर समझावे तो भी यह निर्लज्ज मानता ही नहीं । यह मूर्ख मन समझाने पर भी नहीं समझता, इसीलिए तो इसने न करने के योग्य कार्य भी कर डाले हैं ।
*साच*
*मन ही मँजन कीजिये, दादू दरपण देह ।*
*माँहीं मूरति देखिये, इहिं अवसर कर लेह ॥७५॥*
७५ में सत्य वचन कह रहे हैं - स्थूल शरीर में स्थित मन - दर्पण को भगवद् भजन द्वारा माँजकर कामादि विकार निकालो फिर उसमें भगवत् मूर्ति देखो। यह कार्य इस मनुष्य शरीर के अवसर में ही सत्संग द्वारा कर लेना चाहिए नहीं तो फिर पश्चात्ताप ही होगा । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें