मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

= विन्दु (२)९८ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू चरितामृत(भाग-२)* 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*= विन्दु ९८ =*
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*= भैराणा को प्रस्थान =*
पालकी को उठाने से पूर्व नारायणा नरेश नारायणसिंह से प्रजा के मुख्य मुख्य सज्जनों ने कहा - दादूजी महाराज की पालकी को नगर के मुख्य - मुख्य स्थानों से घुमाते हुये ही नगर से बाहर निकालना चाहिये । जिससे दादूजी महाराज के अन्तिम दर्शन नगर के अतिवृद्ध और वृद्धाओं को भी हो सके । फिर नारायणसिंह ने तथा नगर की प्रजा के मुख्य - मुख्य लोगों ने मिलकर गरीबदासजी आदि संतों को कहा - उन्होंने स्वीकार कर लिया फिर सब ने एक साथ ही “श्रीस्वामी दादूदयालजी महाराज की जय हो जय हो” यह बोल कर पालकी उठाली । 
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पालकी देव निर्मित होने से अति अद्भुत अति सुन्दर और अति हल्की भी थी । उस में विशेष बोझ नहीं था । तथा दादूजी महाराज का शरीर भी हलका ही था और उठाने वालों में भाव का भी बहुत बल था । अतः उन्हें कुछ भी भार ज्ञात नहीं हो रहा था । फिर संकीर्तन - हरिनाम संकीर्तन, हरियश कीर्तन की कई मंडलियां थीं । वे अपने - अपने यूथ बनाकर कीर्तन करती हुई चल रही थीं । पालकी के पास संत जन हरिनाम संकीर्तन करते हुये चल रहे थे । इस दादूजी महाराज की महाप्रयाण यात्रा के साथ थे उन सब के ही वस्त्र सुन्दर थे । संतों ने भी अच्छी चद्दरें बांध रखी थीं । सबके ही मस्तकों पर मंगलमय चन्दन केशर लगे हुये थे । गुलाल, लाजा, पुष्प वृष्टि होती जा रही थी । सर्व संत और सभी भक्त धैर्य युक्त दिखाई दे रहे थे । उक्त प्रकार कीर्तन करते हुये नगर से जा रहे थे तब स्थान स्थान पर दादूजी महाराज की पालकी की आरती उतारी जा रही थी । 
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राजद्वार पर पालकी आई तब राज - परिवार ने भी बड़ी श्रद्धा के सहित भाव प्रेम से पालकी की आरती की । कहा भी है - 
“करत कीरतन ताहि फिराये ।” 
(जनगोपाल विश्राम १५।७३) । 
उक्त प्रकार संकीर्तन करते हुये नगर से निकले । दादूजी महाराज का ब्रह्मलीन होना जो भी संत सुनते थे वे ही व्यथित होते थे । स्थान - स्थान पर सब लोगों में यही बात चल रही थी कि दादूजी महाराज का इस धरा पर से सिधारना जनता के लिये अच्छा नहीं हुआ । वे तो सर्व प्रकार से सदा लोक कल्याण में ही रत्त रहते थे । सम - भाव से युक्त ऐसे महान् संत का यहां पुनः होना संभव नहीं है । 
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दादूजी के बिना हमारी ऐसी ही दशा हो गई है, जैसे दीपक बिना भवन की अर्थात् दीपक बिना घर में अंधेरा हो जाता है, वैसे ही दादूजी के बिना हमारे हृदयों में अज्ञानांधकार छा जायगा । जैसे चन्द्रमा बिना रात्रि की शोभा नहीं होती है, वैसे ही दादूजी के बिना हम शोभा हीन हो जायेंगे । जैसे माता के बिना बालक व्यथित होता है, वैसे ही दादूजी के बिना हमें व्यथा हो रही है । जैसे जल बिना मच्छी की, सरोवर बिना हंस की, गाय बिना बछड़े की दशा होती है, वही आज दादूजी के बिना हमारी हो रही है । जैसा परस्पर कह रहे थे वास्तव में वैसी दशा उनकी हो भी रही थी किन्तु फिर भी वे दादूजी महाराज के ज्ञान के बल पर अपने को सँभाले हुये तथा हरि संकीर्तन करते हुये भैराणा पर्वत की ओर दादूजी महाराज की पालकी के पीछे - पीछे आगे बढ़ रहे थे । जैसे समुद्र की ओर जाणेवाले महानद में इधर - उधर की नदियां मिलती रहती हैं, वैसे ही दादूजी महाराज के महाप्रयाण यात्रा यूथ में चारों ओर से भगवान् के भक्तों के यूथ आ आकर मिलते जाते थे । 
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जन समूह हरि नाम ध्वनि से नभ मंडल को पूर्ण करता हुआ भैराणा की ओर बढ़ रहा था । उक्त प्रकार महाप्रयाण यात्रा का महायूथ आकोदा के पास आया तब आकोदा नरेश केशवदास यूथ से निकलकर ग्राम में गये ओर अपनी प्रजा तथा राजपरवार के सहित आगे आकर ग्राम में प्रवेश करते ही उन्होंने दादूजी महाराज की पालकी की आरती की और जोर से दादूजी महाराज की जय बोली । फिर वह यूथ शीघ्रता से चलता हुआ भैराणा पर्वत की गुफा के पास दक्षिण की खोल में प्रविष्ट हुआ । जहां स्वामी दादूजी महाराज की आज्ञा थी उस स्थान को पहले ही आकोदा नरेश केशवदास ने साफ़ करवा दिया था । 
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उस स्थान पर पहुँच कर जोर जोर से “श्री स्वामी दादू दयालु महाराज की जय हो” । इस प्रकार बारंबार जय बोलते हुये पालकी को उस स्थान पर रखकर सब संतों ने तथा भक्तों ने साष्टांग दंडवत प्रणाम किया । उधर टीलाजी को लाने के लिये जो शीघ्रगामी दूत आमेर को भेजा गया था उसको मार्ग में ही टीलाजी, जगन्नाथजी तहा अन्य भी संत और भक्त मिल गये । वे सब भी भैराणा पर महाप्रयाण यात्रा यूथ के पहुँचने के साथ ही सीधे खोल में आ गये थे । कारण, जाने वाले दूत ने भैराणा पालकी आयेगी यह बता दिया था । 
(क्रमशः)

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