मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

= मन का अंग =(१०/७६-८)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*मन का अँग १०* 
*अन्य लग्न व्यभिचार*
तब ही कारा होत है, हरि बिन चितवत आन ।
क्या कहिये, समझै नहीं, दादू सिखवत ज्ञान ॥७६॥
हरि बिना अन्य चिन्तन व्यभिचार है - जब साधक का मन हरि चिन्तन को छोड़कर अन्य विषयादि के चिन्तन में लगता है तब उसी क्षण मलीन हो जाता है । इस मन के स्वभाव की क्या बात कहें - यह तो ज्ञान सिखाते रहने पर भी नहीं समझता, विषय चिन्तन में लग कर मलीन हो जाता है ।
.
*साँच*
दादू पाणी धोवें बावरे, मन का मैल न जाइ ।
मन निर्मल तब होइगा, जब हरि के गुण गाइ ॥७७॥
७७ - ९३ में सत्य उपदेश कर रहे हैं - अज्ञानी प्राणी जल से स्नान करते रहते हैं किन्तु जल से धोने से स्थूलशरीर ही शुद्ध होता है, मन का मैल नष्ट नहीं होता । मन तो तभी निर्मल होगा, जब भगवद् भक्ति की जायेगी ।
.
दादू ध्यान धरे का होत है, जे मन नहिं निर्मल होइ ।
तो बक सब ही उद्धरैं, जे इहिं विधि सीझे कोइ ॥७८॥
यदि मन निर्मल नहीं हो, तब ध्यान करने से भी क्या लाभ है ? उलटी दँभ से हानि ही होती है । दँभ पूर्वक ध्यान करने से यदि मुक्ति रूप सिद्धावस्था को प्राप्त हो जाय तब तो सभी बगुलों का सँसार से उद्धार हो जाना चाहिए । वे मच्छी पकड़ने के समय ध्यान तो करते ही हैं । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें