गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

= विन्दु (२)९८ =


॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू चरितामृत(भाग-२)* 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*= विन्दु ९८ =*
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*= गुफा पर दादूजी का दर्शन =* 
उसी समय टीलाजी ने गुरुदेव दादूजी महाराज के वियोग व्यथा से व्यथित होकर यह पद बोला - 
हाय दई तैं कहा कियो ? 
हमको मेल्ह कठिन कलियुग में, 
गुरु दादू को कूक१ लियो ॥ टेक ॥ 
ता बिन दुख पावे मेरो जीयो, 
धड़कत छाती कँपत हीयो । 
पंचरात्रि किरपा करके, 
प्रभु दर्शन हमको क्यों न दियो ॥ 
संग के सबै बहुत दुख पावैं, 
जैसे जल बिन मीन जियो । 
करत पुकार नैन नहिं देखत, 
फाटत नाहिं वज्र हियो ॥ 
दर्शन देख बहुत सुख पावत, 
मानहु अमृत अमी पियो । 
टीला जे स्वामी बिन जीवन, 
ता जीवन में कहा जियो ॥ 
(१. कूक लियो = बुला लिया) 
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फिर पर्वत की ओर देखा तो गुफा द्वार पर दादूजी महाराज का दर्शन उन्हें स्पष्ट रूप से हुआ । तब टीलाजी ने उच्च स्वर से कहा - आप लोग किन के शरीर का संस्कार करने के विचार में लगे हैं, स्वामी दादू दयालुजी महाराज तो वे गुफा के द्वार पर खड़े हुए हैं । आप सब देखें तो सही । टीलाजी के उक्त वचन को सुनकर सभी संतों ने तथा भक्तों ने आश्चर्य पूर्वक पर्वत की ओर देखा तो गुफा द्वार पर स्वामी दादू दयालुजी महाराज का दर्शन सभी को अच्छी प्रकार हुआ । दर्शन करने वाले संतों ने तथा भक्तों ने उच्चस्वर से *‘सत्यराम’* बोलकर प्रणाम किया । उस समय दादूजी महाराज के एक हाथ में श्याम छड़ी थी और दूसरे हाथ की अभय मुद्रा से सबको शुभाशीर्वाद दे रहे थे । जब वहाँ आये हुये सभी लोगों को अच्छी प्रकार दर्शन हो गया तब दादूजी महाराज उच्चस्वर से *‘संतों ! सत्यराम’* बोलकर गुफा में प्रविष्ट हो गये । 
“देह अदृष्ट भई तिहिं बारा । 
पर्वत अर्ध देश तहँ द्वारा । 
गुफा मांहिं प्रवेश कराई । 
भक्त जनों को दिई दिखाई ॥७॥” 
(५९ विश्राम, महन्त चेतनजी कृत जीवन चरित्र ।) 
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फिर संतों तथा भक्तों ने पालकी को देखा तो उसमें केवल पुष्पमात्र थे और कुछ भी नहीं था । यह देखकर उन आये हुये सभी लोगों को अति आश्चर्य हुआ था ।
*= पालकी का अदृश्य होना =* 
फिर रज्जबजी आदि संतों ने दादूजी महाराज के संतत्व तथा उनके अवतार का संक्षिप्त परिचय देने का विचार किया किन्तु जिनको पीछे से सूचना मिली वे लोग दादूजी महाराज की जय बोलते हुये झुंड के झुंड आ रहे थे । जो शीघ्र ही आगये उनको तो उस पालकी का दर्शन हो गया था । फिर थोड़ी देर में वह पालकी भी अदृश्य हो गई थी । उसे देखकर सभी संतों को तथा भक्तों को और अति आश्चर्य हुआ । सभी ने कहा - यह तो बड़ा ही अद्भुत खेल हुआ है, ऐसा तो पहले सुना भी नहीं था भाग्यवश आज तो प्रत्यक्ष देख रहे हैं । 
(क्रमशः)

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