🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
*तब कहै तालिब सुनौं मुरसिद,*
*जहां बैठा आप ।*
*वह होइ जैसा कहौ तैसा,*
*जिसै माइ न बाप ॥*
*बैठा उठा कहिये तिसै,*
*औजूद जिसकै होइ ।*
*बेचूंन उसकौ कहत हैं अरु,*
*बेनिमू नै सोइ ॥६॥*
तब जिज्ञासु ने अपने सद्गुरु से प्रश्न किया - भगवन् ! वह ब्रह्म जहाँ विराजमान है, उसका कुछ तो वर्णन कीजिये ? आप तो कहते हैं कि वह अपने जैसा आप ही है, उसके माता-पिता(उत्पादक धर्म) कोई नहीं है ।
बैठना- उठना आदि क्रियाएँ उसी में कही जा सकती हैं जो शरीरधारी हो, जिसका शरीर ही नहिं हैं उसमें सब क्रियाएँ कैसे होगी ! जो निद्रर्व्यक और निरुपम है उसको मेरे जैसा नादान कैसे समझ सकता हैं ? ॥६॥
(क्रमशः)

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