सोमवार, 27 नवंबर 2017

विरक्त का अंग १५(५-८)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि ।*
*सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५* 
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बपु१ वसुधा२ सौं वैर विधि, विरच्या३ लग बैकुण्ठ । 
रज्जब रूचे न विनशती४, यहु उर अंतर अण्ट५ ॥५॥ 
विरक्त का मन शरीर१ तथा पृथ्वी२ के भोगों से और बैकुण्ठ तक से जैसे वैर के द्वारा वैरी से उपराम होता है, वैसे ही उपराम३ हो जाता है, उसे विनाशी४ माया रुचि कर नहीं लगती, विरक्त के हृदय में यह वैराग्य की गाँठ५ ही लग जाती है, अर्थात वह वैराग्य को नहीं छोड़ता । 
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माया काया मत मतैं१, विरच्या प्राण प्रचण्ड२ । 
रज्जब न्यारा नाम बल, नजर नहीं नौ खंड ॥६॥ 
तीव्र२ वैराग्य युक्त प्राणी माया, शरीर और सांसारिक मन के विचारों२ से उपराम हो जाता है, निरंजन राम के नाम चिन्तन के बल से सबसे ही अलग रहता है, इस नौ खंड वाली पृथ्वी के किसी भी पदार्थ पर उसकी रागयुक्त दृष्टि नहीं पड़ती । 
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विरच्या बरते बरतणिहिं, तन मनत्रितिरस्कार । 
जन रज्जब रत नाम सौं, यहु विरक्त व्यवहार ॥७॥ 
उपरामता से सब कार्य करता है, तीनों लोकों के भोगों का तन - मन से अनादर करता है और निरंतर निरंजन राम के नाम में अनुरक्त रहता है, वही विरक्त पुरुष का व्यवहार है । 
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रज्जब रूठा ऋद्धि सौं, सिद्धि सुहावे नाँहिं । 
इन आगे इसका धणी, सो बैठा मन माँहिं ॥८॥ 
विरक्त पुरुष ऐश्ववर्य से उपराम रहता है, सिद्धियाँ उसे प्रिय नहीं लगती, इन सिद्धि आदि से परे इनका स्वामी परमात्मा है, वही विरक्त के मन में निरंतर स्थिर रहता है ।
(क्रमशः)


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