बुधवार, 15 नवंबर 2017

= १६५ =


卐 सत्यराम सा 卐
*साहिब है पर हम नहीं, सब जग आवै जाइ ।*
*दादू सपना देखिये, जागत गया बिलाइ ॥* 
===========================
साभार ~ oshoganga.blogspot.com 
.
एक ऐसी उपस्थिति भी है जिसके बिना घटना नहीँ घटेगी, उपस्थिति जरुरी है घटना के लिये, वह घटना मे भीतर प्रवेश नहीँ करती। मनुष्य चोरी नहीँ कर सकता बिना आत्मा के, आत्मा की उपस्थिति आवश्यक है। अकेला शरीर, लाश कहीँ कोई चोरी करने नहीँ जाती। लाश का चोरी से क्या संबंध, क्योँकि लाश कर्म कर ही नहीँ सकती। अकेला मन भी चोरी करने नहीँ जाता।
.
मन भीतर आत्मा न हो तो सोच ही नहीँ सकता, आत्मा की उपस्थिति आवश्यक है। जिस क्षण आत्मा में प्रवेश होता है, उस क्षण ज्ञात होता है कि उपस्थिति में घटी थी, लेकिन आत्मा ने चोरी में प्रवेश नहीँ किया। उपस्थिति इतनी प्रभावशाली थी कि घटनाएं घटित होने लगीँ। चेतना की उपस्थिति और कर्म शुरु हो जाते हैँ। शरीर सक्रिय हो जाता है, मन सक्रिय हो जाता है। कर्म शुरु हो जाते हैँ।
.
जिस क्षण इस आत्मा मे पुनः प्रवेश होता है समाधि मे, उसी क्षण सारे कर्म से छुटकारा हो जाता है। इसलिये नहीँ कि कर्मोँ ने बांधा था, बल्कि इसलिये कि उन्होने कभी बांधा नही था। और स्वयं अपने तक कभी पहुंचा नहीँ था मनुष्य कि समझ सकता कि मैंक्त हूं। भारतीय मनीषा के अनुसार कर्म करने का खयाल, कर्ता हूं, ये ही बंधन है।
.
जिस क्षण इस उपस्थिति को इसकी उपस्थिति में समझ लेगा मनुष्य-कर्ता की तरह नहीं, साक्षी की तरह-उसी क्षण पाएगा कि जो भी हुआ, वह आस-पास हुआ, उसने नहीँ किया, उसके आस-पास घटना घटी थी और वह फिर भी अस्पर्शित रह गया। रात स्वप्न देखता है मनुष्य और सुबह जाग कर कहता है कि स्वप्न घटा और वह अछूता रह जाता है।
.
स्वप्न में हो सकता है चोरी की हो, ये भी हो सकता है कि कारागृह चले गए होँ, ये भी हो सकता है कि रिश्वत देकर बच गए होँ, कारागृह में न गए होँ। स्वप्न मे कुछ भी हो सकता है। सुबह जाग जाने पर स्वप्न ऐसे तिरोहित हो जाता है जैसे हुआ ही न हो। सुबह उठ कर मनुष्य स्वयं को चोर नहीँ अनुभव करता। 
.
लेकिन क्या मनुष्य के बिना स्वप्न हो सकता था? मनुष्य था तो ही स्वप्न हो सका। मुर्दे को स्वप्न नहीँ आता। मनुष्य की उपस्थिति आवश्यक थी। फिर भी जाग कर मनुष्य ऐसा अनुभव नहीँ करता कि अब क्या करेँ? रात चोरी की है, व्रत करेँ? उपवास करेँ? कोई दान, त्याग करेँ? क्या करेँ? कुछ भी अनुभव नहीँ करता मनुष्य। जागने के कुछ क्षणोँ बाद स्वप्न खो जाता है। समाधि में स्वप्नवत प्रतीत होता है। जो-२ जीया-एक जीवन नहीँ, अनंत जीवन में जो-२ जीया।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें