卐 सत्यराम सा 卐
*जे नांही सो देखिये, सूता सपने माँहि ।*
*दादू झूठा ह्वै गया, जागे तो कुछ नांहि ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com
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एक संत ने सुबह उठ कर अपने एक शिष्य से - जैसे ही वह उठा, उसका शिष्य पास ही खड़ा था - कहा कि रात एक सपना देखा है, तुम्हे बताता हूं, तुम व्याख्या कर दो।
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शिष्य ने कहा - रुकें, मैं जल ला देता हूँ; जरा हाथ मुंह धो लें। वह जल लेने चला गया। संत ने हाथ-मुंह धो लिया और मुस्कराया। तब एक दूसरा शिष्य आ गया। संत ने उससे कहा कि रात एक सपना देखा है, मैंने पहले वाले शिष्य को बताना चाहा कि वह व्याख्या कर सके; तो वह हाथ-मुंह धोने के लिए जल ले आया, तुझे बताता हूं तू व्याख्या कर दे। उसने कहा, रुकें ! एक प्याली चाय पी लें।
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चाय पीकर संत पुनः मुस्कराया और संत ने कहा कि मैं खुश हूं, अब व्याख्या की कोई जरूरत नहीं। वहां मौजूद एक तीसरे आगंतुक ने, जो सब देख रहा था - कहा कि हद है, सपना बताया ही नहीं और सब हल हो गया; कम से कम सपना क्या है, इतना तो शिष्यों को सुन ही लेना था। संत ने कहा, कि ये परीक्षा थी। ये यदि व्याख्या करने में उत्सुक होते, तो इन्हें आश्रम से निकाल कर बाहर कर दिया जाता।
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सपने की क्या व्याख्या करना। सपना ही था। बात समाप्त हो गई। पहले ने ठीक किया कि यदि जरा भी नींद की खुमारी अभी शेष रह गई हो,तो पहले जल से हाथ-मुंह धो लें। दूसरे ने भी ठीक किया कि चाय ले आया। क्योंकि हाथ-मुंह धोकर भी यदि नींद नहीं टूटी है, तो चाय पी लें, जिससे नींद टूट जाये। जाग जाओ, ये ही सपने की व्याख्या है।
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सपने की और व्याख्या हो सकती है क्या? जाग जाओ, सपना व्यर्थ हो जाता है। व्यर्थ की तो कोई व्याख्या करता नहीं। समाधि में जो मनुष्य ने विभाजन किये थे बड़े-२ कर्म, छोटे कर्म, अच्छे कर्म, बुरे कर्म, नीति और अनीति, सदाचार और अनाचार - सब के सब व्यर्थ हो जाते हैं।
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जाग कर पता चलता है कि एक लंबा, अनंतकालीन और अनादि स्वप्न था, मनुष्य केवल उपस्थित था, सपने में प्रविष्ट कभी हुआ नहीं था। इसलिए सब कर्म कट जाते हैं, और धर्म का उदय होता है।

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