#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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*संगति कुसंगति*
दादू असाधु मिले अंतर पड़े, भाव भक्ति रस जाइ ।
साधु मिले सुख ऊपजे, आनंद अँग न माइ ॥६७॥
६७ - ६९ में सुसंगति कुसंगति का फल बता रहे हैं - असँत के मिलने से भगवान् साधन में व्यवधान पड़ता है, भगवद् - विश्वास तथा भक्ति - रस चला जाता है । सँत के मिलने से हृदय में ब्रह्म सुख उत्पन्न होता है और परमानन्द शरीर में समाता भी नहीं, सँतों की स्तुति आदि के रूप में बाहर उमड़ पड़ता है ।
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दादू साधू संगति पाइये, राम अमी फल होइ ।
सँसारी संगति पाइये, विष फल देवे सोइ ॥६८॥
सँतों की संगति प्राप्त होती है तो उसका
फल अमृतत्व देने वाला राम का साक्षात्कार होता है और सँसारी प्राणियों की संगति
प्राप्त होती है तो वह बारँबार मृत्यु देने वाला विषय - वासना रूप फल देती है ।
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दादू सभा सँत की, सुमति उपजे आइ ।
शाकत की सभा बैसताँ, ज्ञान काया तैं जाइ ॥६९॥
सँतों की सभा में आकर बैठने से हृदय में
सुमति उत्पन्न होती है और दुर्जनों की सभा में बैठने से पूर्व - प्राप्त ज्ञान भी
अन्त:करण से चला जाता है ।
(क्रमशः)

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