शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/६४-६)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐


*श्री दादू अनुभव वाणी* 

टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
*सज्जन विपरीत(सँसार से)* 
दादू फिरता चाक कुम्हार का, यों दीसे सँसार । 
साधू जन निश्चल भये, जिनके राम अधार ॥६५॥ 
६४ में सँत और सँसारियों की गति का भेद कह रहे हैं - सँसारी प्राणी विषय - वासना से कुम्हार के चाक के समान सँसार में फिरते हैं और जिनके एक मात्र निरंजन राम का ही आश्रय है, उन सँत जनों की वृत्ति ब्रह्माकार रहने से, वे ब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त करके निश्चल हुये हैं ।
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*सत्संग महिमा*
जलती बलती आतमा, साधु सरोवर जाइ ।
दादू पीवे राम रस, सुख में रहे समाइ ॥६५॥
सत्संग महिमा कहते हैं - क्रोधादि विकारों से दग्ध, त्रिताप से सँतप्त जो जीवात्मा सँत - सरोवर पर जाकर सत्संग में राम भक्ति - रस का पान करता है, वह परम सुख स्वरूप ब्रह्म में समा कर ब्रह्म से स्थिर रहता है ।
*कृत्रिम कर्ता*
काँजी माँहीं भेल कर, पीवे सब सँसार ।
कर्ता केवल निर्मला, को साधू पीवनहार ॥६६॥
६६ में सँसारी प्राणी परमेश्वर का रूप कृत्रिम बना लेते हैं, यह कहते हैं - सँसारी प्राणी परमात्मा के स्वरूप में माया - काँजी मिलाकर फिर उनकी भक्ति - रस का पान करते हैं । माया - मल रहित ब्रह्म के स्वरूप को हृदय में अद्वैत रूप से धारण करके तो केवल सँतजन ही पराभक्ति - रस का पान करते हैं ।
(क्रमशः)

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