#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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दादू सब जग फटिक पषाण है, साधू सैन्धव होइ ।
सैन्धव एकै ह्वै रह्या, पानी पत्थर दोइ ॥९४॥
सँपूर्ण जगत के दँभी - जन श्वेत पत्थर के समान हैं और सँत सैन्धव के समान हैं । सँत - सैन्धव ब्रह्म - जल में मिल कर अद्वैत भाव से रहता है और दँभी - पत्थर ब्रह्म - जल से भिन्न द्वैत भाव से रहता है ।
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*साधु परमार्थी*
को साधु जन उस देश का, आया इहिं सँसार ।
दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समचार ॥९५॥
९५ - ९८ में सँत परमार्थी होते हैं, यह कह रहे हैं - जिसमें परब्रह्म का साक्षात्कार होता है, उस निर्विकल्प समाधि देश का यदि कोई सँत लोक - कल्याणार्थ इस सँसार दशा में उतर कर उपदेश करता हो तो उसको अपने प्रियतम परब्रह्म की प्राप्ति के साधन रूप समाचार पूछना चाहिए, क्योंकि उसे पूरा अनुभव है । साँसारिक विषय नहीं ।
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समाचार सत पीव के, को साधू कहेगा आइ ।
दादू शीतल आतमा, सुख में रहे समाइ ॥९६॥
परब्रह्म - प्राप्ति के सच्चे साधन रूप समाचारों का उपदेश, परब्रह्म को प्राप्त कोई विरला ही सन्त आकर करेगा । उसके उपदेश द्वारा विषमता रूप जलन मिट कर बुद्धि को समता रूप शीतलता प्राप्त होगी और वह मनन - निदिध्यासन द्वारा ब्रह्मानन्द में लीन रहेगी ।
(क्रमशः)

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