#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश ।*
*भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi
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*विरक्त का अंग १५*
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रज्जब तूटी त्रिभुवन, करतों त्रिय तिरस्कार ।
सो योगी यशवंत जग, जग में जै जै कार ॥१३॥
नारी का त्याग करते ही तीनों भुवनों के विषय सुखों से वृत्ति हट जाती है, जो तन मन से नारी का त्याग कर देता है, वह योगी जगत् में यश का भागी होता है और उसकी जगत् में जय ध्वनी होती है ।
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रज्जब आये रहत१ में, उर अबला अनमेल ।
तन से तिय तिरस्कार कर, खेल चले यह खेल ॥१४॥
जो शरीर से नारी का त्याग करके मन से भी नारी से नहीं मिले वे ही यह वैराग्य का खेल खेलकर तथा संसार से चलकर ब्रह्म स्वरूप में आये हैं, अर्थात ब्रह्म१ रूप हुये हैं ।
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नर नारी न्यारा भया, निकस गया नौ खंड ।
रज्जब रखता राम सौं, रही सु माया मंड१ ॥१५॥
विरक्त नर तन मन से नारी से अलग हो जाता है, उसी समय नौ खंड के विषय सुखों से निकल जाता है और राम में अनुरक्त होकर ब्रह्म रूप हो जाता है, फिर माया उसका क्या कर सकती है ? वह तो ब्रह्मांड१ में ही रह जाती है । ब्रह्म में माया का अभाव है ।
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रज्जब त्यागी घर घरनि, पर नारी न सुहाय ।
अहि अपनी तज काँचुली, का की पहरे जाय ॥१६॥
जो विरक्त निज नारी का त्याग देता है, उसे पर नारी अच्छी नहीं लगती, सर्प काँचुली त्यागकर किसी अन्य सर्प की पहनने कब जाता है ?
(क्रमशः)

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