रविवार, 19 नवंबर 2017

= १७३ =

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू विरह प्रेम की लहर में यह मन पंगुल होइ ।*
*राम नाम में गलि गया, बूझे बिरला कोइ ॥* 
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साभार ~ Krishnacharandas Aurobindo
भगवान की भक्ति प्राप्त करने का सरल उपाय वृँदावन के एक प्रसिध्द सिध्द संत श्री राधिकाप्रसादजी(अण्णा-गारु या आन्ध्रा-बाबा) जो अभी गोलोक-धाम प्राप्त हैं.... उन्होंने बताया था।
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उन्होंने जो कहा वही भागवत में भी कहा है। भगवान की प्राप्ति जिन महत् जनों को हुई है ऐसे महा पुरुषों के चरणकमलों में, सत्संग में नित्य प्रति बैठना चाहिये... क्योंकि इनके श्वास-प्रश्वास में भगवान का प्रेम रहता है... जब वे भगवान के प्रेम विरह में कातर होकर रोते हैं तो उनका वह भगवान के लिये रुदन एक संसर्गजन्य रोग की तरह उनके पास बैठे प्रेमी-भक्तों में संक्रमण कर जाता है। (भक्ति - श्रध्दायुक्त से हृदय से..... आपकी रिसेप्टीव्हीटी तभी होती है जब आपके हृदय में संत के प्रति प्रेम-आदर हो... न कि तमासबिन की तरह.... या डाउटींग थॉमस की तरह...!!) जब आपको भगवान के लिये रोने का प्रेम-रोग हो जाय तब आपका उध्दार निश्चित है।
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अण्णा गारुजी को भगवानका दर्शन तो क्या प्रत्यक्ष श्रीराधाराणी का दर्शन हुआ करता था... एक बार श्रीराधाजी बालिका के वेष में उन्हें मिलने आयी और कुछ क्षण बाद गायब हो गई लेकिन पीछे पूरी गली में अण्णा-गारु के कमरें में भरी गुलाब की सुगँध फैल गई.... जो 3/4 दिन तक रही। वो दिव्य गंध थी। अण्णा-गारु ने तुरंत अपने भक्त को बरसाने में श्रीराधाजी के झांकी का वर्णन देखकर बतानेको कहा तो जो वर्णन अण्णागारुजी ने किया वैसे ही निकला और वहाँ गुलाब की गुलाब के फूल तथा पँखुडीयों से फूल बँगला सजा था.... अण्णा-गारु, अम्मा-अम्मा करके 3 दिन तक रोये तब श्रीराधाजी ने उन्हे पुनः दर्शन देकर कृतकृत्य किया।
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ऐसे संतों के सान्निध्य में भगवान की निर्मल भक्ति की प्राप्ति संभव है.... बशर्ते आपका हृदय उसके लिये तैय्यार हो।
जहाँ काम हैं वहाँ राम नहीं। 
जहाँ राम हैं वहाँ नही काम॥
तुलसी कबहु न रह सके।
रवि-रजनी एक ठाम॥
अण्णा गारुका चित्र नहीं मिल रहा इसलिये वृँदावनके महान रसिक महाजन षड्गोस्वामीजी का चित्र दे रहा हुँ। वृँदावन के चैतन्य महाप्रभु के नित्य पार्षद षडगोस्वामी । इनके पगवंदन - (नाम का स्मरण) से अनेक विघ्नों का नाश होता है।

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