🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
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*जब कह्या तालिब सखुन ऐसा,*
*पीर पकरी मौन ।*
*कौ कहेगा न कह्या न किनहूँ,*
*अब कहै कहि कौंन ॥*
*तब देखि बोर मुरीद की,*
*उन पीर मूंदे नैंन ।*
*जौ खूब तालिब होइगा,*
*तौ समझि लेगा सैन ॥७॥*
जब उस जिज्ञासु ने ऐसा प्रश्न किया, तब गुरुदेव चुप रह गये । क्योंकि ऐसे गूढ़ प्रश्न का उत्तर कौन दे पायगा ? आज तक बड़ा से बड़ा ज्ञानी भी इसका उत्तर नहीं दे सका है तो अब कौन उत्तर दे ?
गुरुदेव ने शिष्य की उत्कण्ठा देखकर अपनी आँखे मूंद ली और ध्यानस्थ हो गये । इस तरह गुरुदेव ने अपने व्यवहार से संकेत द्वारा शिष्य को उस ब्रह्म के विषय में सब कुछ बता दिया । अर्थात् मौन द्वारा उन्होंने मौन संकेत द्वारा उस ब्रह्म का वाणी द्वारा वर्णन नहीं हो सकता; क्योंकि वह अनिवर्चनीय है, और आँखे मूंद कर ध्यानस्थ होने से गुरु का तात्पर्य है कि जो उस ब्रह्म का ध्यानस्थ होकर चिन्तन करेगा वही उस ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकेगा, अन्य कोई नहीं ।
इस तरह दो संकेतों के सहारे विवेकी शिष्य को ब्रह्म-प्राप्ति का उपाय बता दिया । बलिहारी है ऐसे सच्चे गुरु की ! ॥७॥
(क्रमशः)

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