मंगलवार, 28 नवंबर 2017

विरक्त का अंग १५(९-१२)

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卐 सत्यराम सा 卐
*चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी ।
माया दासी ताके आगे, जहँ भक्ति निरंजन तेरी ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५* 
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पाइ परी पाई नहीं, ऋद्धि सिद्धि निधि ऐन१ । 
रज्जब त्यागी ते पुरुष, संतति शक्ति न सैन ॥९॥ 
जो नाना प्रकार के ऐश्वर्य, अष्टसिद्धि, नौ निधि साक्षात्१ पैरों में पड़ने पर भी उनको नहीं प्राप्त के समान ही समझते हैं अर्थात उससे उपराम ही रहते हैं । संतान तथा मायिक सुख प्राप्ति के लिये संकेत मात्र ही नहीं करते, उद्योग तो कैसा, वे ही त्यागी पुरुष हैं । 
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मुख की सिलक गूदा की ढीमा, 
त्यागत सोच नहीं कुछ जीमा । 
त्यों विभूति बरतणि ले डारी, 
यूं माया मुनिवर सौ न्यारी ॥१०॥
मुख की लार पंक्ति वा वमन और गुदा का मल इनको त्यागने से मन में कुछ भी चिन्ता नहीं होती, वैसे ही विरक्त पुरुष माया को कार्य में लेकर पटक देते हैं, उसमें राग नहीं करते, इसी से माया मुनिवरों से अलग ही रही है । 
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सोने मुख पीला किया, रूपे किया सुश्वेत । 
जन रज्जब सु वियोग ही, साधु किया नहीं हेत ॥११॥
संतों ने प्रेम नहीं किया, संतों के वियोग दु:ख के कारण ही सोना पीला पड़ गया और चाँदी श्वेत हो गई । 
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जोड़े के सुख से रह्या, जड़ काटी जग माँही ।
रे रज्जब संसार में, सो फिर आवे नाँहिं ॥१२॥
जो नारी पुरुष के जोड़े से होने वाले सुख से अलग रहा है और जगत के धनादि में जो अपनी आसक्ति रूप जड़ जमी थी उसे वैराग्य से काट दी है, वह पुन: संसार में नहीं आता ब्रह्म में लीन हो जाता है ।
(क्रमशः)

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