#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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*रस*
दादू मीठा पीवे राम रस, सो भी मीठा होइ ।
सहजैं कड़वा मिट गया, दादू निर्विष सोइ ॥७४॥
भक्ति - रस का फल बता रहे हैं - जो साधक मधुर सन्तों के सत्संग में जाकर मधुर राम - रस का पान करता है, वह भी मधुर सन्त हो जाता है । जिनने पूर्व में पान किया है, उनका क्रोधादिक कटुपना सहज ही नष्ट हो गया और वे विषय - वासना - विष से रहित हुये हैं ।
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*साधु परीक्षा लक्षण*
दादू अंतर एक अनँत सौं, सदा निरँतर प्रीति ।
जिहिं प्राणी प्रीतम बसे, सो बैठा त्रिभुवन जीति ॥७४॥
सन्त परीक्षा का लक्षण बता रहे हैं - जो सदा प्रतिक्षण प्रीति पूर्वक अन्तर वृत्ति द्वारा एक अनन्त परमात्मा के चिन्तन में तत्पर रहता है, इस प्रकार साधन करने पर जिसके हृदय में प्रियतम परमात्मा विशेष रूप से निवास करते हैं, वह त्रिभुवन को विजय करके परब्रह्म के स्वरूप में स्थिर हुआ है ।
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*साधु महिमा*
दादू मैं दासी तिहिं दास की, जिहिं संग खेले पीव ।
बहुत भांति कर वारणे, तापर दीजे जीव ॥७५॥
प्रभु प्राप्त सन्त पर अपनी श्रद्धा प्रकट कर रहे हैं - जो महानुभाव सन्त अपने स्वामी परमात्मा को प्राप्त करके उसके संग आनन्द लेते हैं, हम उनकी सेविका के समान हैं । हे साधको ! उक्त प्रकार के सन्तों पर अपने प्राण बहुत - भाँति से निछावर कर देना चाहिए ।
(क्रमशः)

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