सोमवार, 20 नवंबर 2017

भयभीत भयानक का अंग १४(५-८)

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卐 सत्यराम सा 卐
*दादू सुध बुध आत्मा, सतगुरु परसे आइ ।*
*दादू भृंगी कीट ज्यों, देखत ही ह्वै जाइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
**भयभीत भयानक का अंग १४**
चंदन संगति चांदनी, पारस कचंन होय । 
कीट भृंग भय मिल भये, तो डर सम और न कोय ॥५ ॥ 
चंदन का संग होने से वनी चन्दन के भय से चन्दनी(चंदन की गंध से युक्त) हो जाती है । पारस के भय से लोहा स्वर्ण बन जाता है । भृंग के भय से कीट भृंग हो जाता है । अत: पूर्व स्थिति बदलने में निपुण भय के समान अन्य कोई भी नहीं है । 
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जन रज्जब सात्त्विक१ लिये, गरीबी गरकाब२ । 
तो प्राणी पानी जमे, मारग ह्वै सिर आब३ ॥६॥ 
पानी शीत के भय से जमता है तब उसकी चमक१ बढ़ जाती है, वैसे ही ईश्वर भय से प्राणी में सात्त्विकता२ आती है तब उसका अभिमान नष्ट हो जाता है और वह गरीबी में निमग्न रहता है, इस भय के मार्ग से प्राणी के शिर की शोभा३ बढ़ जाती है । 
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निर्भय नटनी पुहमि१ पर, बरत२ चढे भय भीत । 
त्यों रज्जब चढ़ सुरति पर, भय मिल होय अतीत३ ॥७॥ 
पृथ्वी१ पर नटनी निर्भय रहती है तब तो उसे धन्यवाद नहीं मिलता, रस्से२ पर चढ़कर गिरने के भय से भीत होती है तब ही दर्शक उसे धन्यवाद देते हैं । वैसे ही जो साधक ब्रह्माकार - वृत्ति पर आरूढ़ होकर ब्रह्म भिन्न वृत्ति न हो जाय इस भय से युक्त रहता है, वह सर्व प्रपंच से अलग३ होकर ब्रह्मरूप हो जाता है तब ही उसे धन्यवाद मिलता है । 
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ज्यों जहाज के थंभ शिर, रह्या काक तज तेज । 
त्यों रज्जब भय भीत ह्वै, करहु नाम सौं हेज१ ॥८॥ 
काक पक्षी अपने देश की ओर मुख कर बैठता है, अत: दिशाज्ञान के लिये जहाज में काक पक्षी रखते थे और समुद्र में दूर जाने पर छोड़ देते थे समुद्र में अन्य स्थान बैठने को मिलता न था तब वह अपने तेज-बल का त्याग करके भयभीत हुआ जहाज के स्तंभ पर ही बैठ जाता था । वैसे ही मृत्यु आदि के भय से डरकर ईश्वर नाम-चिन्तन में ही प्रेम१ करो ।
(क्रमशः)

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