#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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*साधु साक्षी भूत*
जिसका तिसको दीजिये, सुकृत पर उपकार ।
दादू सेवक सो भला, शिर नहिं लेवे भार ॥५५॥
५५ - ५७ में कहते हैं - सन्त साक्षीरूप रह कर परोपकार करते हैं - जिसकी प्रेरणा से सुकृत रूप परोपकार होता है, उसी परमेश्वर को, उसके कर्तापन और फल का भार देना चाहिए । जो अपने शिर पर उक्त भार नहीं लेता वही सँत साक्षी रूप होने से अच्छा माना जाता है ।
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परमारथ को राखिये, कीजे पर उपकार ।
दादू सेवक सो भला, निरँजन निराकार ॥५६॥
अपना शरीर आदि सभी वस्तुएं परोपकार के लिए ही धारण करनी चाहिए और साक्षी रूप रहकर उनसे परोपकार करना चाहिए । जो कर्तापन तथा फलाशा से रहित साक्षी रूप रह कर परोपकार करता है, वही उत्तम भक्त निरंजन निराकार को प्राप्त होता है ।
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सेवा सुकृत सब गया, मैं मेरा मन माँहिं ।
दादू आपा जब लगैं, साहिब माने नाँहिँ ॥५७॥
जिनने मन में "मैं कर्ता हूं, इसका फल मेरा है" ऐसी भावना रखकर भक्ति और सुकृत रूप परोपकार किया है, वह सब भगवत् की प्राप्ति कराने में समर्थ न होने से परमार्थ दृष्टि से निष्फल हो गया । कारण, जब तक मन में अहँकार रहता है, तब तक भगवान् सेवादि स्वीकार नहीं करते ।
(क्रमशः)

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