卐 सत्यराम सा 卐
*न तहाँ चुप ना बोलणां, मैं तैं नांहीं कोइ ।*
*दादू आपा पर नहीं, न तहाँ एक न दोइ ॥*
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‘शब्द आदि ऐंद्रिक विषयों के प्रति राग के अभाव से और आत्मा की अदृश्यता से जिसका मन विक्षेपों से मुक्त होकर एकाग्र हो गया, ऐसा ही मैं स्थित हूं।’
‘शब्द आदि के प्रति जो प्रेम है, भाव है, उससे मैं मुक्त हो गया हूं।’
शब्द में बड़ा रस है। शब्द का अपना संगीत है। शब्द का अपना सौंदर्य है। शब्द के सौंदर्य से ही तो काव्य का जन्म होता है। शब्द में जो बहता हुआ रस है, उसको ही एक श्रृंखला में बांध लेने का नाम ही तो कविता है। शब्द को यदि हम गुनगुनाएं , तो मीठे शब्द हैं, कड़वे शब्द हैं, सुंदर शब्द हैं, असुंदर शब्द हैं। कोई हमे गाली दे जाता है, वह भी उसी वर्णमाला से बने अक्षरों का उपयोग कर रहा है।
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कोई हमसे कह जाता है, मुझे तुमसे बड़ा प्रेम है, कोई धन्यवाद दे जाता है। इन सभी में एक ही वर्णमाला है, कोई गाली दे कि कोई हमारी प्रशंसा करे। परन्तु कुछ शब्द हृदय पर अमृत की वर्षा कर देते हैं, कुछ शब्द काटे चुभा जाते हैं, कुछ घाव बना जाते हैं। शब्द की बड़ी पकड़ है, बड़ी जकड़ है मनुष्य के मन पर। हम शब्द से ही जीते हैं, शब्द केवल तरंग है।
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जनक ने कहा. शब्दादे: प्रीत्यभावेन, शब्द के प्रति वह जो मेरा राग है, वह मेरा गया। क्योंकि मैंने देख लिया मैं शब्दातीत हूं, मैं शब्द के पीछे खड़ा हूं। शब्द तो ऐसे ही हैं जैसे हवा के झकोरे पानी में लहरें उठा जाते हैं। शब्द तो तरंग मात्र हैं, न अच्छे हैं न बुरे हैं। इसलिए यदि कोई दूसरा व्यक्ति किसी दूसरी भाषा में हमे कुछ कहे, तो कुछ परिणाम नहीं होता, चाहे वह गालियां ही दे रहा हो।
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भाषा समझ में न आए तो फिर मनगढ़ंत है सब हिसाब। जब तक समझ में आता है, तब तक अच्छा शब्द, बुरा शब्द, जब समझ में नहीं आता तो सभी शब्द बराबर हैं, कोई अर्थ नहीं है। शब्दों में अर्थ नहीं है, अर्थ माना हुआ है। शब्द तो केवल ध्वनियां हैं, अर्थहीन।
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जिस दिन यह समझ में आ जाता है कि शब्द तो केवल ध्वनियां हैं, अर्थहीन, उस दिन जीवन में एक बड़ी अभूतपूर्व घटना घटती है। हम शब्द से मुक्त होते हैं, तो हम समाज से भी मुक्त हो जाते हैं। क्योंकि समाज यानी शब्द। बिना शब्द के कोई समाज नहीं है। इसलिए तो जानवरों का कोई समाज नहीं होता, आदमियों का समाज होता है। समाज के लिए भाषा चाहिए। दो को जोड्ने के लिए भाषा चाहिए। अगर दो के बीच भाषा न हो तो जोड़ नहीं पैदा होता। तो भाषा समाज को बनाती है। भाषा आधार है।
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अब जिस व्यक्ति को सच में ही संन्यासी होना हो, उसे समाज से भागने की कोई आवश्यकता नहीं; केवल भाषा का जो राग-विराग है, उससे मुक्त हो जाना पर्याप्त है। बस इतना जान ले कि शब्द तो मात्र ध्वनियां है, अर्थहीन, मूल्यहीन, न अच्छे हैं, न बुरे हैं। ऐसा जानते ही, हम अचानक पाएंगे हम मुक्त हो गए समाज से। अब हमें कोई न तो गाली दे कर दुखी कर सकता है, न प्रशंसा करके हमें प्रसन्न कर सकता है। जिस दिन हम लोगों के दुख देने और सुख देने की क्षमता के पार हो गए, उस दिन हम पार हो गए।

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