#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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*भ्रम विध्वँसन*
दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही सन्त ।
आपा पर एकै भया, छूटी सबै भरँत१ ॥७७॥
टीलाजी का भ्रम दूर कर रहे हैं - जिनकी साँसारिक भ्राँति१ नष्ट होकर अपना पराया एक हो गया, उन अद्वैत स्थिति को प्राप्त हुये सँतों में राजा राम की शक्ति आ जाती है । उस शक्ति के द्वारा सभी सँत ऐसी लीला करते रहते हैं ।
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*जग जन विपरीत*
दादू आनंद सदा अडोल सौं, राम स्नेही साध ।
प्रेमी प्रीतम को मिले, यहु सुख अगम अगाध ॥७८॥
जगत् से विपरीत परमात्मा की ओर जाने वाले सन्तों के सुख का परिचय दे रहे हैं - राम के प्यारे सन्त सदा निश्चल परमात्मा के चिन्तन में लगे रहने से आनन्द में रहते हैं । सँसारी प्राणी विषयों में लगे रहने से दुखी रहते हैं । परमात्मा के प्रेमी सन्त अपने प्रियतम परमात्मा को प्राप्त होते हैं । यह ब्रह्म - प्राप्ति रूप आनन्द अगम अगाध है ।
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*पुरुष प्रकाशी*
घर वन माँहीं राखिये, दीपक ज्योति जगाइ ।
दादू प्राण पतँग सब, जहं दीपक तहं जाइ ॥८०॥
८० - ८४ में ज्ञान दीपक से प्रकाशित हृदय सन्त का परिचय दे रहे हैं - दीपक की ज्योति जगाकर चाहे घर में रक्खो वो वन में, पतँग तो वहां ही चले जायेंगे । वैसे ही ज्ञान - दीपक के प्रकाश से युक्त पुरुष घर में रहो या वन में, जिज्ञासु प्राणी तो सब वहां ही पहुंच जायेंगे ।
(क्रमशः)

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