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卐 सत्यराम सा 卐
*पिंड परोहन सिन्धु जल, भव सागर संसार ।*
*राम बिना सूझै नहीं, दादू खेवनहार ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi
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**भयभीत भयानक का अंग १४**
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जे सांई का सोच ह्वै, तो मन फुले नाँहिं ।
जन रज्जब सिमट्या रहै, ज्यों अजा उभयसिंह माँहिं ॥९॥
दो सिंहो के पींजरो के बीच में बाँधकर रक्खी गई बकरी को कितना ही खिलाओ वह मोटी नहीं होती, वैसे ही यदि ईश्वर का भय हो तो मन सांसारिक विषयों से नहीं फूलता, संकुचित ही रहता है ।
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रज्जब राम न भूलिये, जे मीच रहै मन माँहिं ।
याद करन को आदमी, या सम ओर सु नाँहिं ॥१०॥
यदि मृत्यु का भय मन में रहे तो प्राणी राम को नहीं भूल सकता । हे मानव ! भगवान् को याद कराने का साधन इस मृत्यु भय के समान अन्य कोई भी नहीं है ।
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रज्जब डर घर साधु का, महा पुरुष रहै माँहिं ।
तिन के सब काज सरे, जु बाहर निकसे नाँहिं ॥११॥
संतों का स्थान भय ही है, महापुरुष भय में ही निवास करते हैं अर्थात मृत्यु, बुराई, आसुर गुणादि से सदा ही डरते रहते हैं, जो मृत्यु आदि के भय से मन को बाहर नहीं जाने देते उनके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं ।
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रज्जब डर डेरा बडा, बडे रहैं बिच आय ।
भय को भय लागे नहीं, नर देखो निरताय ॥१२॥
भय रूप स्थान महान् है, बड़े पुरुष भी निर्भयता से बुरे कर्म करने की स्थिति से आकर भय में ही रहते हैं अर्थात बुराइयों से डरते रहते हैं । हे नरों ! जो स्वयं भय में स्थित है उसको भय नहीं लग सकता ।
(क्रमशः)

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