गुरुवार, 30 नवंबर 2017

= १९४ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*साचा सिर सौं खेल है, यह साधु जन का काम ।*
*दादू मरणा आसँघै, सोई कहैगा राम ॥* 
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साभार ~ स्वामी सौमित्राचार्य
“प्रपत्ति”
‘नमामि भक्तमाल को’
राजा जगदेव जी – २
राजा जगदेव जी की रिझवार निष्ठा का वर्णन हुआ, अब उनकी धर्म निष्ठा का वर्णन सुनिए. एक यवन राजकुमारी इनकी रिझवार निष्ठा पर आसक्त हो गयी और उसने अपने पिता से कहा कि उसे राजा से विवाह करना है. बादशाह ने राजा को बुलाकर बहुत समझाया, फिर अनेक प्रकार का प्रलोभन दिया और अंत में भय भी दिखाया पर राजा नहीं माने. बादशाह ने खींज कर राजा को मार डालने का आदेश दे दिया.
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जब बधिक लोग राजा को मारने लेकर जा रहे थे तब राजकुमारी ने उन्हें रोककर कहा कि उसे राजा से प्यार है. राजा को नहीं मारा जाए और उसने राजा को अपने सामने बुलाया. उसे लगा कि अगर राजा उसे एक बार देख लेंगे तो विवाह से मना नहीं करेंगे. राजकुमारी ने राजा से उसकी ओर देखने को कहा पर राजा ने मुँह मोड़ लिया. तब राजकुमारी ने गुस्से में आकर सिपाहियों से कहा कि राजा का सिर काटकर उसके पास लाया जाए. ऐसा ही किया गया. पर जब राजा का कटा हुआ सिर राजकुमारी के सामने रखा गया तो वह सिर भी पीछे मुड़ गया. राजा की ऐसी धर्म निष्ठा देखकर सभी प्रभावित हो गए.
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जो धर्म पर चलता है उसकी कभी हार नहीं होती है. हारता तो सदा अधर्मी ही है. अधर्मी का प्रयोजन कभी सफल नहीं होता है. जो धर्मनिष्ठ है उसका धर्म उसके एक अंग को भी झुकने नहीं देता है.
“स्वामी सौमित्राचार्य”

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