#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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*साधु परमार्थी*
सब ही मृतक समान हैं, जीया तब ही जाणि ।
दादू छाँटा अमी का, को साधू बाहै आणि ॥१००॥
१०० - १०४ में साधु परमार्थी होते हैं यह कहते हैं - हरि - विमुख सभी प्राणी बारँबार मरने के कारण मृतक समान ही हैं । यदि कोई ज्ञानी सन्त भाग्यवश आकर ज्ञानामृत की उपदेश रूप विंदू जिस पर डालता है और वह उसे धारण करके ब्रह्म को अभेद रूप से प्राप्त कर लेता है, तब ही उसे जीवित जानो ।
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सब ही मृतक ह्वै रहे, जीवैं कौन उपाइ ।
दादू अमृत रामरस, को साधू सींचे आइ ॥१०१॥
सभी सँसारी प्राणी मृतक तुल्य हो रहे हैं, वे किस उपाय से जीवित हो सकते हैं ? हां, एक उपाय है, यदि कोई परमार्थी सन्त आकर उन पर राम - रस रूप अमृत का छिड़काव करे तो वे जीवित हो सकते हैं ।
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सब ही मृतक देखिये, क्यों कर जीवैं सोइ ।
दादू साधू प्रेमरस, आणि पिलावे कोइ ॥१०२॥
सभी सँसारी प्राणी हरि - भक्ति से हीन होने से भीतर से मृतक तुल्य ही हैं । वे किस प्रकार जीवित हो सकते हैं ? हां, यदि कोई परमार्थी सन्त आकर भगवत् प्रेमा - भक्तिरस पान करावे तो जीवित हो सकते हैं ।
(क्रमशः)

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