शनिवार, 18 नवंबर 2017

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卐 सत्यराम सा 卐
*सहज शून्य सब ठौर है, सब घट सबही माहिं ।*
*तहाँ निरंजन रम रह्या, कोई गुण व्यापै नाहीं ॥* 
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com 

'भोगने योग्य पर वासना न जाग्रत हो, तब समझना वैराग्य की अवधि और अहं - भाव का उदय न हो, तब समझना ज्ञान की परम अवस्था।' 
वैराग्य से साधारणतः अर्थ निकाला जाता है-विराग। विराग, राग के विपरीत है। 
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राग का अर्थ है, सौन्दर्य दिखाई पड़े, सुस्वादु भोज्य दिखाई पड़े, सुखद परिस्थिति दिखाई पड़े तो भोग लेने का, उसमे लीन होने का जो मन पैदा होता है, वह है राग। अपने से बाहर सुख दिखाई पड़े तो स्वयं को खोकर सुख मे डूबने की आकांक्षा राग है। 
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विराग का अर्थ है, भोगने योग्य के प्रति विकर्षण पैदा हो जाना, उससे दूर हटने का मन पैदा हो जाना, उससे मुख मोड़ लेने की इच्छा होना। वैराग्य राग का उल्टा नहीँ, राग का अभाव है। इसे गहराई से समझेँ। संसार के प्रति आकर्षण है, ये राग हुआ। संसार से विकर्षण पैदा हो जाए, संसार से भाग जाने का मन हो-ये हुआ विराग।
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जब संसार मे होना न होना बराबर हो जाए, न आकर्षण हो, न विकर्षण हो; चुनाव न रहे, कोई आग्रह न रहे-तब वैराग्य। वैराग्य का अर्थ है दृष्टि पर पर जानी बंद हो गईः न अनुकूल, न प्रतिकूल; न आकर्षण में, न विकर्षण में। दूसरे से पूरा छुटकारा वैराग्य है। संबंध ही न रहा, असंग, असंबंधित हो गए।
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जगत की भाषा में पाप बुरा और पुण्य अच्छा है। समाज की दृष्टि से उचित है, लेकिन परम-दृष्टि मे दोनो व्यर्थ हैँ। क्योँकि वहां कर्ता होना पाप है, वहां तो जो अकर्ता है, निरहंकारी है वही प्रवेश पाएगा। जो है ही नहीँ, मिट गया और शून्य हो गया वही वहां प्रवेश कर पाएगा। जो भी मनुष्य के पास है, वह कर्म से मिला है। कर्म से जो भी मिला है उसकी सीमा मन है।
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आत्मा तक कर्म से मिला कुछ भी नही पहुंचता 'समस्त समूह वासना का हो जाता है नष्ट, पुण्य-पाप नाम के कर्म जड़ से उखड़ जाते हैँ, तब यह तत्वमसि परोक्ष ज्ञानरुप मे प्रकाशित होता है।' पहली बार अनुभव मे आता है कि क्या है ये ऋषि-वचन, तत्वमसि-वह तू ही है।
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परोक्ष ! अभी भी ये स्पष्ट नहीँ हुआ होता,सीधा साक्षात्कार नहीँ होता। अभी पास में होने की प्रतीति हो रही है। 'परोक्ष ज्ञानरुप में प्रकाशित होता है, और फिर...।' जब ये परोक्ष ज्ञान थिर हो जाता है और इसमें किसी तरह की कहीँ कोई जरा भी विपरीत की लहर नहीं रह जाती, निस्संदिग्ध ठहर जाता है, तब - 'फिर हाथ में रखे आंवले की तरह अपरोक्ष ज्ञान को उत्पन्न करता है।' तब मनुष्य स्वयं घोषणा करता है-तत्वमसि। अब मनुष्य स्वयं प्रमाण बन जाता है।

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