शनिवार, 18 नवंबर 2017

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#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*कहे कहे का होत है, कहे न सीझै काम ।*
*कहे कहे का पाइये, जब लग हृदै न आवै राम ॥* 
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साभार ~ स्वामी सौमित्राचार्य 

“प्रपत्ति”
‘नमामि भक्तमाल को’
*परमधर्मपोषक संन्यासी भक्त श्री मधुसूदनसरस्वती जी*
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इनका जन्म सोलहवीं शताब्दी में बंगाल के फरीदपुर जिले के कोटालपाड़ा गाँव में हुआ था. इनके पिता जी का नाम प्रमोदन पुरंदर था. इनके बचपन का नाम कमलनयन था. इन्होंने नवद्वीप के हरिराम तर्कवागीश से न्यायशास्त्र का अध्ययन किया था. वेदान्त का अध्ययन इन्होंने काशी के दण्डीस्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी से किया और यहीं संन्यास ग्रहण किया था. संन्यास का इनका नाम ‘मधुसूदनसरस्वती’ पड़ा.
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इनको शास्त्रार्थ करने की धुन थी. बड़े-बड़े विद्वानों को ये अपनी प्रतिभा से हरा चुके थे. पर भगवान श्री कृष्ण तो इन्हें अपनाना चाहते थे तो एक वृद्ध दिगंबर परमहंस ने आकर इनसे कहा -
- ‘स्वामी जी ! सिद्धांत की बात करते समय तो आप अपने को असंग, निर्लिप्त ब्रह्म कहते हैं, पर सच बताइए, क्या विद्वानों को जीतकर आपके मन में गर्व नहीं होता ?’
- ‘क्या आप पराजित होकर भी प्रसन्न रह पाएंगे ?’
- ‘यदि आपको घमंड होता है तो ब्राह्मणों को दुखी एवं अपमानित करने का पाप भी लगेगा.’
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इन बातों ने स्वामी जी के मन पर गहरी चोट करी. ये लज्जित महसूस करने लगे. तब परमहंस जी ने इनसे पांडित्य का अभिमान छोड़कर भगवान श्री कृष्ण की शरण लेने को कहा. स्वामीजी ने महात्मा जी के चरण पकड़ लिये. दयालु संत ने इन्हें श्री कृष्णमंत्र देकर उपासना और ध्यान की विधि बतलाई. 
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महात्मा जी के जाने के बाद तीन महीनों तक इन्होंने उपासना करी पर जब कोई लाभ नहीं दिखा तो घूमने निकल पड़े. रास्ते में इन्हें फिर वही संत मिले और कहा कि लोग तो भगवत्प्राप्ति के लिये जन्मों-जन्मों साधना करते हैं, आप तो तीन महीने में ही घबड़ा गए. इन्हें अपनी भूल का एहसास हो गया. इन्होंने गुरुदेव के चरण पकड़ लिये तथा वापस काशी आकर भजन में लग गए. यहाँ श्यामसुन्दर ने इनको दर्शन दिए और इनका जीवन बदल गया.
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अद्वैतसिद्धि, सिद्धांतबिन्दु, वेदान्तकल्पलतिका आदि के लेखक ने श्रीकृष्ण-प्रेम के वशीभूत होकर भक्तिरसायन, गीता की गूढार्थदीपिका नामक व्याख्या और श्रीमद्भागवत की व्याख्या लिखी.
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यहाँ महात्मा जी ने स्वामी जी को जो उपदेश दिया, वह बहुत महत्वपूर्ण है. हमें भी यह देखना चाहिए कि जिन बातों का हम पक्ष लेते हैं और उनका प्रचार करते हैं, क्या वो हमारे अन्दर हैं या क्या हम उन्हें अपने अन्दर लाने की कोशिश कर रहे हैं ? कहीं अपने कृत्यों द्वारा हम मात्र अपने अभिमान को ही तो पोषित नहीं कर रहे हैं ?
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कभी-कभी हम सिद्धांतों की आड़ लेकर दूसरों को नीचा दिखाने में ही लगे रहते हैं और यह देखना भूल जाते हैं कि हमारे द्वारा भी सिद्धांतों का दुरूपयोग हो रहा है. हम भी अपराधी ही हैं. इसलिए कल्याण का मार्ग तो श्री हरि की भक्ति ही है. भक्ति हराना नहीं बल्कि प्रसन्नतापूर्वक हारना सिखा देती है और हमें, लोगों को क्या, स्वयं श्री हरि को जीतना(मतलब प्रभु को पाना) सिखा देती है.
“स्वामी सौमित्राचार्य”

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