गुरुवार, 23 नवंबर 2017

= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४-२) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
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*तब उठि अरज उस्ताद सौं मैं,*
*करी ऐसी रौस ।*
*तुम मिहर मुझ पर करौ मुरसिद,*
*मैं तुम्हारी कौस ॥*
*वह बन्दगी किस रौस करिये,*
*मुझे देहु बताइ ।*
*वह राह सीधा कौन है,*
*जिस राह बन्दा जाइ ॥२॥*
तब मैंने उनके सामने खड़े होकर अत्यन्त ही नम्रता से इस तरह से(रौस) निवेदन किया कि भगवन् ! मैं आपका बहुत ही क्षुद्र शिष्य हूँ, मैंने आपके चरणों का सहारा पकड़ लिया है, मैं आपका शरणागत बन चुका हूँ !
मुझे कृपया बताइये कि यह भक्ति सरलतया कैसे प्राप्त की जा सकती है ? वह कौन सा सरल मार्ग है जिस पर चल कर मैं आपका शिष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकूँ ॥२॥
(क्रमशः)

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