गुरुवार, 23 नवंबर 2017

भयभीत भयानक का अंग १४(१३-६)

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卐 सत्यराम सा 卐
*दादू बहु बंधन सौं बंधिया, एक बिचारा जीव ।*
*अपने बल छूटै नहीं, छोड़नहारा पीव ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
**भयभीत भयानक का अंग १४**
भय मिल सब कारज सरैं, भय मिल निपजे साध । 
रज्जब अज्जब ठौर डर, डर घर अगम अगाध ॥१३॥ 
विचार पूर्वक भय युक्त कार्य करने से भी सभी कार्य सिद्ध होते हैं, मृत्यु आदि के भय से युक्त रहने से ही मन में साधु-पना उत्पन्न होता है । भयरूप स्थान अदभुत है तथा भयरूप घर में निवास करने से प्राणी अगम अगाध ब्रह्म को प्राप्त होता है । 
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भय मधि भूत भला रहे, डर सौं डिगे सु नाँहिं । 
संशय सोच सहाय को, मुनि सुमिरें मति माँहिं ॥१४॥ 
वृत्ति में भय रहने से प्राणी अच्छा रहता है अर्थात पाप कर्मों में प्रवृत नहीं होता, भय के कारण ही अपने धर्म कार्यों से नहीं डिगता । संशय और शोक के सहायक भय मुनि भी अपनी मति में चिन्तन करते हैं अर्थात मुनि भी डरते हैं, तभी वे सदा स्वधर्म में स्थित रहते हैं । 
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भाव भक्ति का मूल भय, भय कर भजिये राम । 
रज्जब भय मिल भृत्य१ ह्वै, भय में सीझे काम ॥१५॥ 
भय-भाव तथा मुक्ति का कारण है, चन्मादि भय से डर के ही राम का भजन किया जाता है । जो जन्मादि भय से युक्त होता है, वही राम का भजन करके भक्त१ होता है । संसार-बन्धन से डरता है तभी मुक्ति का साधन करता है और साधन से ज्ञान द्वारा मुक्ति रूप कार्य सिद्ध होता है । 
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महर कहर तैं डरपिये, करत हरत क्या वेर । 
ता थैं भय भागे नहीं, रज्जब समझ्या फेर ॥१६॥ 
दया युक्त तथा क्रोध युक्त दोनों ही व्यक्तियों से डरते रहना चाहिये, कारण क्रोधी को क्रोध करते क्या देर लगती है और दयालु को दया त्यागते क्या देर लगती है । इसलिये हृदय से भय से भय नहीं भागना चाहिये । हमने इनके परिवर्तन को भली प्रकार समझ लिया है, अत: डरते रहते ही सब काम करना चाहिये । 
(क्रमशः)

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