#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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दादू इस सँसार में, ये द्वै रहे लुकाइ ।
राम सनेही सँतजन, औ१ बहुतेरा आइ ॥६१॥
इस सँसार में एक तो हमारे प्यारे - निरंजन राम, दूसरे सच्चे सँत, ये दोनों छिपे ही रहते हैं । कारण, ज्ञानहीन सँसारी प्राणी निरंजन राम को नहीं जानते और सच्चे सँत प्रतिष्ठादि के द्वारा ब्रह्म - चिन्तन में विघ्न के भय से छिपे ही रहते हैं । अन्य१ साकार राम की मूर्तियों के दर्शन मंदिरों में होते हैं और१ प्रतिष्ठा प्रिय साधु भी बहुत से भ्रमण करते आते हैं ।
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*साधु परीक्षा लक्षण*
जिनके हिरदै हरि बसे, सदा निरँतर नाँउं ।
दादू सांचे साधु की, मैं बलिहारी जाँउं ॥६२॥
६२ - ६३ में सँत परीक्षा के लक्षण कहते हैं - जिनके हृदय में सदा हरि बसते हैं, निरँतर नाम का चिन्तन रहता है; वे ही सच्चे सँत हैं । हम उनकी बलिहारी जाते हैं ।
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सांचा साधु दयालु घट, साहिब का प्यारा ।
राता माता राम रस, सो प्राण हमारा ॥६३॥
जिसका अन्त:करण दयालु है, जो परमात्मा का प्यारा है, रामभक्ति - रस में रत्त - मत्त है, वह सच्चा सँत हमारा तो मानो प्राण ही है ।
(क्रमशः)

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