गुरुवार, 16 नवंबर 2017

ब्रह्म अग्नि का अंग १२(८-१०)

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卐 सत्यराम सा 卐
*ब्रह्म भक्ति जब उपजै, तब माया भक्ति बिलाइ ।*
*दादू निर्मल मल गया, ज्यूँ रवि तिमिर नसाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
**ब्रह्म अग्नि का अंग १२**
तप्त कुण्ड ब्रह्म अग्नि है, जीव जल सदा गर्म । 
वासदेव१ बल हीन विरह की, उन्हैं२ शीत सु मर्म ॥८॥ 
ब्रह्म ज्ञानरूप अग्नि तप्त कुंड की उष्णता के समान है, जैसे तप्त कुंड का जल सदा उष्ण रहता है, वैसे ही ब्रह्म ज्ञानाग्नि से जीव सदा उष्ण रहता है, अर्थात उसमें मैं जन्मता हूँ मरता हूँ, कर्ता हूँ, भोगता हूँ इत्यादिक शीतलता नहीं आती और विरहरूप अग्नि१ बलहीन है, प्रियतम मिलन पर शान्त हो जाता है । यही ब्रह्म ज्ञानाग्नि और विरहग्नि के उष्ण२ तथा शीतलता का सुरहस्य है । 
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ब्रह्म अग्नि श्रुति१ सार२ में, ताव सहे गुण दोय । 
रज्जब रज तज नीकसे, वस्तू अनूप होय ॥९॥ 
लोह२ में अग्नि डाला जाता है और लोह उसके तप को सहन करता है तब उसमें एक तो उसका मैल जल जाने से निर्मलता आती है दूसरे उसकी जो भी वस्तु बनाओ वह अनुपम सुन्दर बनती है । वैसे ही प्राणी के कानों१ में ब्रह्म ज्ञान गुरु उपदेश द्वारा पड़ता है, तब वह रजोगुणादि गुणों को त्यागकर सांसारिक भावनाओं से निकलता है और ब्रह्म रूप अनुपम वस्तु बन जाती है । 
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‪पंच एक पच्चीस उभय को, माया माखी खाय । 
ब्रह्म अग्नि संयोग ताप तैं, अजरी१ तहां न जाय ॥१०॥ 
आकाशादि पंचभूत, उनसे बना एक शरीर, पच्चीस प्रकृति, मन मति दोनों इन सबको माया रूप मक्खी खा जाती है, किन्तु जैसे मक्खी अग्नि के पास नहीं जाती है, वैसे ही ब्रह्म ज्ञानाग्नि का संयोग जिसके अन्त:करण में होता है, वहां उसके ताप के भय से वह माया मक्खी१ नहीं जाती । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित ब्रह्म अग्नि का अंग १२ समाप्त । सा. ४९२॥
(क्रमशः)

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