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卐 सत्यराम सा 卐
*विरह अग्नि तन जालिये, ज्ञान अग्नि दौं लाइ ।*
*दादू नखशिख परजलै, तब राम बुझावै आइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi
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**एकांगी प्रीति का अंग ११**
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आत्म औषधि क्या करे, आगे रोग असाध्य ।
बहु विधि बूटी बन्दगी, लागे नाँहिं आराध्य ॥९॥
यदि शरीर में असाध्य रोग हो, तो बहुत प्रकार की बूटी आदि औषधियाँ भी उसको दूर नहीं रख सकेंगी, वैसे ही प्रेमपूर्वक नाना भांति से सेवा पूजा करने पर भी आराध्य देव के हृदय में भक्त सम्बन्ध प्रेम नहीं लगे, तो यह एकांगी प्रीति दु:खप्रद ही होगी ।
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वज्र१ न वेधी बींधणी, ब्रह्म बन्दगी तेम२ ।
रज्जब करुणा३ कर थके, रीझे नहीं सु नेम ॥१०॥
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काष्ठादि में छेद करने वाली बींधनी हीरा१ में छेद नहीं कर सकती त्योंहि२ सेवा - पूजादि साधन ब्रह्म पर प्रभाव नहीं डाल सकते । बहुत ही भक्त दु:खपूर्वक३ विनय करते हुये थक गये हैं किन्तु ब्रह्म नियमादि साधनों से प्रसन्न नहीं होते । अत: वे जब तक भक्त से प्रेम न करें तब तक एकांगी प्रीति क्लेशप्रद ही है ।
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अकल कलहुँ कलिये१ नहीं, सब भागे जिव जोर ।
रज्जब रही सु एक ही, दर्श दया प्रभु ओर ॥११॥
कला रहित ब्रह्म से बाह्य साधन रूप कलाओं द्वारा संबन्ध१ नहीं किया जाता, उससे सम्बन्ध करने में जीव के सभी बल हार मान कर भाग गये हैं, उस प्रभु के दर्शनार्थ एक मात्र उनकी दया ही सफल रही है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित एकांगी प्रीति का अंग ११ समाप्त । सा. ४८२ ॥
(क्रमशः)

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