सोमवार, 13 नवंबर 2017

= ब्रह्मस्तोत्र अष्टक(ग्रन्थ २३-१) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= ब्रह्मस्तोत्र अष्टक(ग्रन्थ २३) =*
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(इस अष्टक में संस्कृत मिश्रित भाषा के माध्यम से निराकार ब्रह्म का वर्णन नेति, नेति कहकर किया है । पाठक को भाषा का रस पाठ्य विषय के साथ-साथ मिलता है - यह इस अष्टक की अतिरिक्त विशेषता है । सन्तों में ऐसी मिश्रित भाषा में लिखने की परम्परा का निर्वाह महाकवि यहाँ कर रहे हैं ।)
*- भुजंगप्रयात -*
*अखण्डं चिदानन्द देवाधिदेवं ।*
*फणिन्द्रादि रुद्रादि इन्द्रादि सेवं ।*
*मुनिन्द्रा कवीन्द्रादि चन्द्रादि मित्रं ।*
*नमस्ते नमस्ते नमस्ते पवित्रं ॥१॥*
हे प्रभो ! आप अखण्ड(पूर्ण, बाधारहित एवं अविनाशी) हैं, सच्चिदानन्दस्वरूप हैं । अधिक शक्तिमान् होने के कारण देवताओं के भी अधीश्वर हैं शेषनाग, शंकर इन्द्र आदि सर्वशक्तिसम्पन्न देवता भी आपकी सेवा करने में ही अपना भला समझते हैं ।
सनक, सनन्दन, सनत्कुमार आदि मुनि, व्यास-वाल्मीकि आदि कवि, चन्द्र-सूर्य आदि देवता भी आपका ही गुणगान करते रहते हैं । अतः हे पवित्र !(निष्पाप, निष्कलंक, मायारहित) आपको प्रणाम है, प्रणाम है, प्रणाम है ॥१॥
(क्रमशः)

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