शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

= १८२ =


卐 सत्यराम सा 卐
*ऐसा अवधू राम पियारा,* 
*प्राण पिंड तैं रहै नियारा ॥टेक॥*
*जल लग काया तब लग माया,* 
*रहै निरन्तर अवधू राया ॥१॥*
*अठ सिधि भाई नो निधि आई,* 
*निकट न जाई राम दुहाई ॥२॥*
*अमर अभय पद बैकुंठ बासा,* 
*छाया माया रहै उदासा ॥३॥*
*सांई सेवक सब दिखलावै,* 
*दादू दूजा दृष्टि न आवै ॥४॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥
'जिसने साधनों से क्रिया-रहित स्वरूप अर्जित किया है, वह पुरुष कृतकृत्य है। और जो ऐसा ही, अर्थात स्वभाव से स्वभाव वाला है, वह तो कृतकृत्य है ही, इसमें कहना ही क्या। 
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इस श्लोक का अर्थ है : जिसने साधनों से क्रिया रहित स्वरूप अर्जित किया है, जिसने तप से, जप से, ध्यान से, मनन चिंतन से, निदि ध्यासन से स्वभाव को पाया, वह पुरुष तो कृतकृत्य है ही। ठीक है। लेकिन जिसने ऐसा कुछ भी नहीं किया, और जो ऐसा ही बिना कुछ किए,’स्वभाव वाला हूं’, ऐसा जान कर शांत हो गया है, उसकी तो बात ही क्या कहनी, उसकी कृतकृत्यता तो अवक्तव्य है। तो जिसने कुछ कोशिश करके परमात्मा को पा लिया, वह कोई चमत्कार नहीं है। जिसने बिना कुछ किए, बैठे-बैठे, बिना हिले-डुले, सिर्फ बोध-मात्र से परमात्मा को उपलब्ध कर लिया, उसकी कृतकृत्यता तो कही नहीं जा सकती; उसे तो शब्दों में बांधने का कोई उपाय नहीं है।
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एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
जिसने साधन से पाया, ठीक है, धन्यभागी। 
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ।
परन्तु कैसे करें उसका गुण वर्णन, कैसे करें उसकी प्रशंसा, जिसने बिना कुछ किए पा लिया, जनक कहते हैं : मैंने तो बिना कुछ किए पा लिया। न कहीं गया, न कहीं आया; अपनी ही जगह बैठ कर पा लिया है।
इन श्लोक का मनन करना हैं, बहुत गहरा श्लोक हैं ये, अष्टावक्र: गीता कोई साधरण पुस्तक नही, यह एक महान शास्त्र हैं, यह जीवन का शास्त्र हैं। शास्त्र और पुस्तक का यही भेद है। पुस्तक एक बार पढ़ लेने से व्यर्थ हो जाती है। शास्त्र अनेक बार पढ़ने से भी व्यर्थ नहीं होता। शास्त्र तो तब तक व्यर्थ नहीं होता, जब तक हम शास्त्र न बन जाएँ। तब तक उसे पढ़ते ही जाना; कौन जाने किस मुहूर्त में कोई शब्द जगा दे। 
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ये श्लोक पंख बन सकते हैं। इन श्लोकों के सहारे हम उड़ सकते हैं, अनंत की दूरी पार कर सकते हैं, ये श्लोक अनूठे हैं, बहुमूल्य हैं। इनसे मूल्यवान कभी भी कहा नहीं गया है। इनका खूब पाठ करना, ये धीरे-धीरे तुम्हारे रक्त में मिल जाएं, ये तुम्हारी मांस-मज्जा बन जाएं। ये तुम्हारे हृदय की धड़कनों में समा जाएं। जाने, अनजाने, जागते -सोते इनकी छाया हमारे पीछे बनी रहे, तो, तो ही, उस महाक्रांति की घटना घट सकती है। और उसके बिना घटे हम चैन नहीं पा सकेंगे। उसके बिना घटे, कभी किसी ने चैन नहीं पाया है।

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