#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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जिहिं घट प्रकट राम है, सो घट तज्या न जाइ ।
नैनहुं माँहीं राखिये, दादू आप नशाइ ॥८२॥
जिस शरीर के अन्त:करण में राम का ज्ञान - प्रकाश प्रकट रूप से है, ऐसे सँत के शरीर की सेवा हम से त्यागी नहीं जाती । ऐसे ज्ञानी सन्त को नेत्रों के आगे रखते हुये अपना साँसारिक अहँकार हटाकर सदा उसका सत्संग करना चाहिए ।
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*पुरुष प्रकाशी*
दादू जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखे सोइ ॥८३॥
ज्ञान प्रकाश सम्पन्न पुरुष का परिचय दे रहे हैं - जिस पुरुष के अन्त:करण में ब्रह्म का यथार्थ ज्ञान - दीपक है, उसके हृदय में अज्ञानाँधकार नहीं रहता । उस ज्ञान - ज्योति के प्रकाश से वह सम्पूर्ण जगत् को ब्रह्म रूप देखता है ।
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*साधु अबिहड़*
कबहुं न बिहड़े सो भला, साधू दिढ़ मति होइ ।
दादू हीरा एक रस, बांध गाँठड़ी सोइ ॥८४॥
साधक वो सँत की श्रेष्ठता बता रहे हैं - जो ज्ञानी सँत में दृढ़ बुद्धि से श्रद्धा करके सत्संग करे और उनका जो एकरस ज्ञानरूप हीरा है, उसे अन्त:करण रूप गठरी में बांध कर कभी भी न त्यागे, वही साधक श्रेष्ठ है वो जो सन्त दृढ़ मति होकर, एकरस ब्रह्म रूप हीरा को ब्रह्माकार, वृत्ति रूप गठरी में बांध कर कभी भी न त्यागे, वही ज्ञानी सँत श्रेष्ठ है ।
(क्रमशः)

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