#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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दादू अवगुण छाड़ै गुण गहै, सोई शिरोमणि साध ।
गुण अवगुण तैं रहित है, सो निज ब्रह्म अगाध ॥९१॥
जो अपने हृदय के काम - क्रोधादिक अवगुणों को त्यागे और दूसरों के अवगुण देखना त्यागे तथा क्षमादि दैवी गुणों को धारण करे और दूसरों के गुण ही देखे, वही शिरोमणि सँत माना जाता है और जो गुण - अवगुण से रहित है, वह तो सबका निज - स्वरूप अगाध ब्रह्म रूप ही होता है ।
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*जग जन विपरीत*
दादू सैन्धव फटिक पषाण१ का, ऊपरि एकै रँग ।
पानी माँहीं देखिये, न्यारा न्यारा अँग ॥९२॥
९२ - ९४ में जगत् के पाखँडी जन और सन्त जन की विपरीतता बता रहे हैं - सैंधव नमक का और श्वेत बिल्लौर पत्थर१ का ऊपर से तो एक - सा ही रँग दिखाई देता है, किन्तु जल में डालकर देखोतो उनका स्वरूप भिन्न - भिन्न प्रतीत होता है । सैंधव पानी में घुल जायगा, किन्तु पत्थर नहीं । वैसे ही सन्त और पाखँडी जनों का ऊपर से भेष तो एक सा ही भासता है किन्तु साधना की परिपाकावस्था में अपने आप ही भेद खु जाता है, वही आगे दिखा रहे हैं ।
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दादू सैंधव के आपा नहीं, नीर खीर परसँग ।
आपा फटिक पषाण के, मिले न जल के संग ॥९३॥
सैंधव में कठौरता न होने से वह जल में दुग्ध के समान मिल जाता है । श्वेत पत्थर में कठौरता होने से वह जल में नहीं मिलता । वैसे ही सच्चे सँत में जीवत्व अहँकार न होने से वह ब्रह्म में लय हो जाता है । दँभी में जीवत्व अहँकार होने से वह ब्रह्म में लय नहीं हो पाता ।
(क्रमशः)

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