मंगलवार, 14 नवंबर 2017

= ब्रह्मस्तोत्र अष्टक(ग्रन्थ २३-२) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= ब्रह्मस्तोत्र अष्टक(ग्रन्थ २३) =*
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*धरा त्वं जलाग्नी मरुत्त्वं नभस्त्वं ।*
*घट त्वं पट त्वं अणुत्वं महत्त्वं ।*
*मनस्त्वं वचसत्वं दृग त्वं दृश त्वं ।*
*नमस्ते नमस्ते नमस्ते समत्वं ॥२॥*
स्वामिन् ! पञ्च महाभूतों में पृथ्वी जल, अग्नि, वायु, और आकाश तत्व आप ही हैं । उन पञ्च महाभूतों से उत्पन्न होनेवाले विकार घट, पट, मठ आदि में आप ही हैं सृष्टि का अणु तत्व(वैशेषिक मत से सृष्टि का उपादान कारण) और महत्त्व(सांख्य मत से) आप ही का अंश है । मन- वाणी आदि में आप ही व्याप्त हैं, आप ही चक्षुरिन्द्रिय हैं, आप ही उसके विषय हैं । हे समत्व रूप से सर्वत्र व्यापक ! आपको प्रणाम है, प्रणाम है, प्रणाम है ॥२॥
(क्रमशः)

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