卐 सत्यराम सा 卐
*दादू बूड़े ज्ञान सब, चतुराई जल जाइ ।*
*अंजन मंजन फूंक दे, रहै राम ल्यौ लाइ ॥*
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साभार ~ ओशो गंगा/ Osho Ganga
मधु मिट्टी के भांड में है, अथवा स्वर्णपात्र में।
दृष्टि का यह द्वैत नहीं छल पायेगा रसना के ब्रह्म को।
द्वैत छल पाता है केवल बुद्धि को, अनुभव को नहीं।
यदि हम किसी मधु(शहद) का स्वाद चखे, तो ये नही देखते की बर्तन सोने का था अथवा मिटटी का, हम केवल स्वाद को ही देखेंगे। हम कहेंगे की ये शहद हैं, चासनी नही, परंतु ये कदापि नही देखेंगे की बर्तन सोने का हैं, अथवा मिटटी का।
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संसार में जो भागा जा रहा है वह सिर्फ पात्रों की चिंता कर रहा है, सुंदर देह देख कर मदमस्त हो जाता है मानव, चाहे भीतर जहर भरा हो किसी के, हम केवल उसका ऊंचा पद देख कर पागल जाते है, चाहे ऊंचे सिंहासन पर बैठ कर सूली ही क्यों न लगती हो। लगती ही है। ऊंचे सिंहासन पर जो बैठा है, वह सूली ही पर लटका है।
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हमें उसकी भीतर की पीड़ा पता नहीं। उसके भीतर की अड़चन पता ही नहीं, न सोता है न जागता है। प्रत्येक छन में बस सिंहासन को ही पकड़े बैठा है। और कोई उसकी टांग खींच रहा है, कोई पीछे से खींच रहा है, कोई गिराने का प्रयास कर रहा है, कोई चढ़ने प्रयास कर रहा है।
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सिंहासन पर जो बैठा है, वह बैठ कहां पाता है। बैठा दिखाई पड़ता है संसार में। उसकी वास्तिकता का हमें बोध नहीं है। जनता में आता है तो मुस्कुराता आता है। वे सब चेहरे हैं, उन चेहरों से धोखे में मत पड़ना। परंतु जिसने जीवन के रस को लिया वह तत्क्षाण पहचान लेता है कि बाहर मधु नहीं है, मधु का धोखा है। बाहर स्वाद नहीं है, स्वाद का धोखा है।

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