🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
.
*= ज्ञान-झूलनाष्टक(ग्रन्थ २६) =*
.
*कोई नीरै कहै कोई दूरि कहै,*
*आपु हि नीरै न दूर है रे ।*
*दिल भीतर बाहर एक सा है,*
*असमान३ ज्यौं वो भरपूर है रे ॥*
*अनुभव बिना नहि जान सकै,*
*निरसन्ध४ निरन्तर नूर है रे ।*
*उपमा उसकी अब कौन कहै,*
*नहिं सुन्दर चन्द न सूर है५ ॥२॥*
(३. असमान=आसमान, आकाश ।) {४. निरसन्ध=निःसन्धि(अखण्ड, पूर्ण} (५. चन्द न सूर = न वह चांद है न सूरज । अर्थात् उनसे अत्यन्त अधिक तेजमान है क्योंकि ये उसको प्रकाशित नहीं कर सकते हैं ।)
उस परम तत्व को कोई(ज्ञानी) नजदीक(समीप) बताता है, कोई दूर बतता है, परन्तु वह(सूक्ष्मतम होने के कारण) न नजदीक है न दूर है । वह आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक है ।
इस तत्व का कोई भी व्यक्ति बिना अनुभव के साक्षात्कार नहीं कर सकता । वह मेरा स्वःस्वरूप निः सन्धि(अखण्ड) तथा शाश्वत(अविनाशी) है । महात्मा कहते हैं - उसको किस उपमा से समझाया जाय । न वह चन्द्रमा है न सूर्य । अर्थात् वह इनसे भी अधिक तेज(प्रकाश) वाला है, अतः ये भी उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं ॥२॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें