#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*मध्य का अँग १६*
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ना हम छाड़ै ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार ।
मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥७॥
७ - ८ मेँ मध्यमार्ग के सन्त की स्थिति बता रहे हैं - हम न कुछ त्यागते और न ग्रहण करते, ऐसे जिनके ज्ञान के विचार हैं और पक्ष - विपक्ष से रहित मध्य - भाव से सदा भगवद् - भक्ति करते हैं, वे ही मुक्ति - धाम के द्वार पर स्थित हैं ।
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आपा२ मेटे मृत्तिका१, आपा३ धरे अकास ।
दादू जहं जहं द्वै नहीं, मध्य निरँतर वास ॥८॥
पृथ्वी१ आदि भूतों से रचित मरण - धर्मा स्थूलशरीर और सूक्ष्म शरीर के दुर्बल, गौर, सुखी, दु:खी आदि अहँकार२ को त्याग कर, मैं उसी ब्रह्म का स्वरूप हूं, इस प्रकार अपना अहँकार३ परब्रह्म - आकाश में स्थापन करे और जिस - जिस भावना में पक्ष - विपक्ष रूपादि द्वैत न हो, उसी मध्य मार्ग की भावना में सदा रहे, वही मध्य - मार्ग का सन्त है ।
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*ध्येय - परम स्थान निरूपण*
दादू इस आकार तैं, दूजा सूक्षम लोक ।
तातैं आगैं और है, तहंवां हर्ष न शोक ॥९॥
९ - १६ में ध्येय ब्रह्म सँबँधी विचार कर रहे हैं - इस स्थूलाकार अन्नमय कोश से आगे प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोशरूप सूक्ष्म - लोक हैं और आगे आनन्दमय कोश है । उससे आगे साक्षी रूप ब्रह्म है, उसमें हर्ष - शोकादि द्वन्द्व नहीं है ।
(क्रमशः)

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