शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

= १८ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*संगहि लागा सब फिरै, राम नाम के साथ ।*
*चिंतामणि हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥* 
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साभार ~ स्वामी सौमित्राचार्य
“प्रपत्ति” ~ ‘नमामि भक्तमाल को’

*भगवद्भक्तों के भक्त श्री शंकर जी*
एक बार ये अपने गाँव से दूसरे गाँव गए हुए थे. वहाँ इन्होंने देखा कि एक सेठ के द्वार पर कई साधू खड़े हैं और कुछ अनुनय-विनय कर रहे हैं. इन्होंने साधुओं को प्रणाम करके उसका कारण पूछा. पता चला कि साधुओं को भोग के लिये गेहूं का आटा और घी चाहिए पर सेठ बेझड़ के आटे की पर्ची काट रहा है. शंकर जी ने सेठ से कहा कि उसकी जेब से तो कुछ जा नहीं रहा है. सामान पंचायत से मिलना है तो गेहूं के आटे और थोड़े घी की पर्ची काट दे जिससे साधुओं की सेवा हो जायेगी. सेठ ने इनसे कहा कि अगर इनको साधुओं की इतनी चिंता है तो सबको अपने साथ जे जाएँ और सामान दे दें.
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शंकर जी ने साधुओं से कहा कि वो लोग इनके साथ ही चलें क्योंकि अश्रद्धालु का अन्न भी नहीं लेना चाहिए. वैसे शंकर जी के घर में आवश्यक सामान नहीं था पर फिर भी घर का सामान बेचकर इन्होंने गेहूं के आटे और घी का प्रबंध करके साधुओं को संतुष्ट किया. इनकी संत निष्ठा से प्रभु बहुत प्रसन्न हुए और एक वैश्य का रूप धरकर इनके पास आये. प्रभु के हाथ में मोहरों से भरी थाल थी. उसे देते हुए बोले कि भगवान की प्रेरणा से आपको यह दिया जा रहा है और इससे संत-सेवा करी जाए. इतना कहते ही वह अंतर्धान हो गए. तब इन्हें पता चला कि स्वयं प्रभु ही आये थे और संत-सेवा का सामर्थ्य एवं उपदेश दे गए.
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श्री भगवान को संत-सेवा बहुत प्रिय है. साधुसंत भगवंत को बहुत प्रिय हैं. जो साधुसंतों की सेवा करते हैं भगवान उसे अपनी सेवा ही मानते हैं या अपने प्रति की गयी सेवा से भी अधिक मानते हैं. उससे प्रभु तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं. जो पूरी श्रद्धा और प्रसन्नता से साधु सेवा करता है उसे कभी किसी चीज़ की कमी प्रभु नहीं होने देते हैं. साधु-सेवा की सामर्थ्य प्रभु प्रदान करते हैं. बस ध्यान ये रखना है कि यह भाव न हो कि पहले सामर्थ्य दिखे तब सेवा करें. जब हम सेवा शुरू करेंगे तो सामर्थ्य मिलने लगेगी. इसलिए हम भी श्रद्धा से साधु-सेवा करें.
“स्वामी सौमित्राचार्य”

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