#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*मध्य का अँग १६*
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साधु - अँग के अनँतर सँतों की पक्ष - विपक्ष से रहित मध्य स्थिति का वर्णन करने के लिए, "मध्य का अँग" कथन में प्रवृत्त मँगल कर रहे हैं –
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दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवत: ।
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥
जिनकी कृपा से साधक पक्ष - विपक्ष से पार होकर मध्य मार्ग द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते हैं, उन निरंजन राम, सद्गुरु और सँतों को हम अनेक प्रणाम करते हैं ।
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दादू द्वै पख रहिता सहज सो, सुख दुख एक समान ।
मरे न जीवे सहज सो, पूरा पद निर्वान ॥२॥
२ - ६ में मध्य - मार्ग के साधक की विशेषता तथा उसकी सेवा करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जिसकी विचार दृष्टि में साँसारिक सुख - दु:ख एक समान हैं, वह अनायास ही सम्प्रदायादि द्वैत - भाव के पक्ष - विपक्ष से रहित होता है और वही सन्त जन्म - मरण से रहित सहज - स्वरूप निर्वाण - पद को प्राप्त होता है ।
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सुख दुख मन माने नहीं, राम रँग राता ।
दादू दोन्यों छाड़ सब, प्रेम रस माता ॥३॥
जो सन्त राम - रँग में रत होने के कारण
सुख - दु:ख होने पर भी मन में नहीं मानता और द्वैत भाव जन्य पक्ष - विपक्ष दोनों
भावनाओं से होने वाले सभी विचारों को छोड़कर प्रेमाभक्ति - रस में मस्त है, वही मध्य मार्ग का साधक
है ।
(क्रमशः)

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