गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

संपत्ति विपत्ति हरन का अंग १८(५-८)

卐 सत्यराम सा 卐 
*जब निराधार मन रह गया, आत्म के आनन्द ।*
*दादू पीवे रामरस, भेटे परमानन्द ॥* 
========================= 
**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*संपत्ति विपत्ति हरन का अंग १८* 
.
पूजा पुष्टि से दीन ह्वै, बिन पुजा बलवंत । 
रज्जब लीन्ही बाल बुधि, समझया साधू संत ॥५॥ 
बालक को सुन्दर सिंहासन पर बैठाकर बहुत पूजा करने से दीन-सा होगा, और माता की गोद में बिना पूजा ही बलयुक्त सा भासेगा । वैसे ही विचारशील संतों ने बल बुद्धि का आश्रय लिया है, वे पूजा प्रतिष्ठा से प्रसन्न नहीं होते, दीन से हो जाता है और साधारण स्थिति में आत्म-बल युक्त प्रसन्न रहते हैं । 
.
संपत्ति में सिमटी रहै, विपति विगासे जोय । 
साधु कली ज्यों जाय की, गुण नहिं व्यापै कोय ॥६॥
संत जाय-बेली के पुष्प की कली के समान है, जैसे वह वृक्ष के लगी रहती है तब तक तो सिकुड़ी रहती है और वृक्ष से अलग होने लगती है तब खिल जाती है, वैसे ही संतों का जब तक माया से संबन्ध रहता है तब तक तो संकुचित रहते हैं और माया की अभाव रूप विपत्ति आती है तब वैराग्य से विकसित हो जाते हैं, फिर उनको कामादि कोई भी गुण व्यथित नहीं करता । 
.
आकिल अंध्रिप शक्ति सलिल लेहिं, तो तन कोमल कोर । 
रज्जब रहता उभय रस, काया कष्ट कठोर ॥७॥ 
वृक्ष को उचित समय पर जल मिलता रहे तब तो उसके पत्तों की कोरें कोमल रहती हैं और नहीं मिले तो कठोर हो जाती हैं - सूखती नहीं, वैसे ही बुद्धिमान को मायिक सुख मिलते रहें तब तक कोमल रहता है और नहीं मिले तो शारीरिक कष्ट में भी दृढ़ रहता है अर्थात मन में खेद नहीं मानता । 
.
बहु पुजा मन लघु भये, तुच्छ सेवा दीरघ्घ । 
रज्जब अज्जब देखिये, महन्त महोदधि मघ्घ ॥८॥ 
वर्षा ऋतु में बहुत जल आने पर तो समुद्र लघु रहता है, बढ़ता नहीं और शरद् ऋतु में बहुत जल आने पर तो समुद्र लघु रहता है, बढ़ता नहीं और शरद् ऋतु में जल कम आता है तब बढ़ता है, वैसे ही संतों की बहुत पूजा होने पर तो उनका मन लघु हो जाता है, अर्थात उससे हर्षोल्लास नहीं होता और प्रतिष्ठा की कमी होती है तब ब्रह्म चिन्तन की अधिकता से हर्षोल्लास बहुत होता रहता है । उक्त प्रकार महान् संत और समुद्र का यह सिद्धान्त मार्ग अदभुत ही देखा जाता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित संपत्ति विपत्ति मद हरण का अंग १८ समाप्त । सा. ५८९ ॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें