#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव ।
साधु सुधारस आन कर, दादू बर्षे पीव ॥१०३॥
सभी सँसारी प्राणी आत्मज्ञान न होने से मृतकवत् ही देखे जाते हैं । ये जीव किस प्रकार जीवित हो सकते हैं ? हां, यदि परमात्मा, परमार्थी सन्त - बादल को यहां ही लाकर ब्रह्म - ज्ञान - सुधा - रस की वृष्टि करावे, तो जीवित हो सकते हैं ।
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हरिजल बर्षे बाहिरा१, सूखे काया खेत ।
दादू हरिया होइगा, सींचनहार सुचेत ॥१०४॥
सँत - बादल से हरि - भक्तिप्रद उपदेश रूप जल की वर्षा हो किन्तु श्रोता यदि बहिर्मुखी हो तो उसकी काया - भूमि का अन्त:करण खेत सूखेगा व उपदेश धारण न करने से काम - क्रोधादि के झँझावात१ द्वारा विनष्ट होगा । यदि अन्त:करण खेत को सींचने वाला जिज्ञासु भली प्रकार सावधान होगा तो श्रुति द्वारा उपदेश - जल को अन्त:करण खेत में ले जायेगा और उससे भक्ति ज्ञानादि की उत्पत्ति द्वारा अन्त:करण - खेत ब्रह्मानन्द रूप हरियाली को प्राप्त होगा ।
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*कुसंगति*
गँगा यमुना सरस्वती, मिलैं जब सागर माँहिं ।
खारा पानी ह्वै गया, दादू मीठा नाँहिं ॥१०५॥
१०५ - ११० में कुसंगति के त्याग की प्रेरणा कर रहे हैं - गँगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियाँ जब क्षार - समुद्र में मिलती हैं, तब उनका मधुर जल, मधुर न रहकर खारा हो जाता है । वैसे ही कुसंग से अच्छा अन्त:करण भी बुरा बन जाता है । अत: कुसंगति को त्यागो ।
(क्रमशः)

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