रविवार, 3 दिसंबर 2017

विरक्त का अंग १५(२५-८)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*माता नारी पुरुष की, पुरुष नारी का पूत ।*
*दादू ज्ञान विचार कर, छाड़ गये अवधूत ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५*
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विरक्तताप हुं पौणि१ की, सो सम कही न जाय । 
बीज२ बुहारी की पङिणीं३, नर देखो निरताय४ ॥२५॥ 
हे नरो ! विचार४ करके देखो, घर में बिजली२ के पड़ने३ से और बुहारी के पड़ने से एक सा ही संताप होता है क्या ? अर्थात नहीं, वैसे ही भगवद् वियोग जन्य ताप विरक्त संत की और पशु१ समान अज्ञानी प्राणी की समान नहीं कही जाती । 
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धौ गति टूटे एक को, सालर गति सब कोय । 
रज्जब टूटा सो भला, जो फिर हर्या१ न होय ॥२६॥ 
सालर वृक्ष की डाली टूट कर पृथ्वी के संबंध से पुन: हरी हो जाती है, ऐसे ही विरक्त होकर पुन: विषयों में अनुरक्त होने वाले तो सभी हैं अर्थात दोष दृष्टि से सभी को वैराग्य होता रहता है किन्तु वे पुन: राग में फंस जाते हैं । धोकड़ा वृक्ष की डाली टूट जाने पर पुन: हरी नहीं होती, ऐसे ही जो विरक्त होकर पुन: विषयों में राग नहीं करता ऐसा कोई विरला ही होता है और जो विरक्त होकर पुन: अनुरक्त१ नहीं होता वही विरक्त श्रेष्ठ होता है । 
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मिहरी मूंगोड़ी भई, साधू मन भया काग । 
जन रज्जब जो यूं तजे, ताके मोटे भाग ॥२७॥ 
जैसे मूंगोड़ी को काक पक्षी नहीं खाना चाहता, वैसे ही संत का मन नारी संग नहीं चाहता । जैसे काक ने मूँगोड़ी तजी वैसे ही जो नारी को तज देता है उसका विशाल भाग्य है । 
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मूंगोड़ी वायस तजी, त्यों वैरागी तज वाम१ ।
पंखी की पर२ लीजिये, रज्जब सरे सु काम ॥२८॥ 
जैसे काक पक्षी ने मूंगोड़ी तजी है वैसे ही हे विरक्त तू नारी१ को त्याग दे । पक्षी की यह श्रेष्ठ२ शिक्षा धारण कर वा पक्षी जैसे अपने पंख२ को त्याग कर पुन: धारण नहीं करता, वैसे ही नारी को त्याग कर पुन: उसे धारण मत कर तभी तेरा मुक्ति रूप कार्य सम्यक सिद्ध होगा ।
(क्रमशः)

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