🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्रीसाभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराजhttps://www.facebook.com/DADUVANI.*= अजब ख्याल अष्टक(ग्रन्थ २५) =*.*= छन्द =* *उस नूर तैं सब नूर दीसै,**तेज तैं सब तेज हैं ।* *उस जोति सौं सब जोति चमकै,**हेज१ सौं सब हेज हैं ॥**आफ्ताब अरु महताब तारे,**हुकम उसके चाल है२ ।* *यौं कहत सुन्दर कब्जदुन्दर,**अजब ऐसा ख्याल है ॥७॥* (१. हेज = प्रेम ।) (२. चाल है = चलते हैं ।) उस तेज से सारा जगत् क्रियावान् है, उसके चैतन्य से सब चेतन हैं । उस ब्रह्मज्योति से समग्र प्रकाशित होता है । उसके प्रेम(प्रसन्न होकर दिये फल) से सब सुखी है । अग्नि, सूर्य, तारे - सभी उसके तेज से चमक रहे है । सब उसकी आज्ञा से चलते- फिरते(क्रियावान्) हैं । (परन्तु) इन्द्रियनिग्रह के बिना उस आश्चर्यमय तेज तक कैसे पहुँचा जा सकता है ! ॥७॥ .*= दोहा =* *सुन्दर आलिम३ इलम सब, खूब पढ्या आंखूंन४ ।* *परि उसकौं क्यौं कहि सकै, जो कहिये बेच्यूंन५ ॥९॥* (३. आलिम =(अ०)विद्वान, ज्ञानी ।)(४. आषून =(फा०)“आखुबन्द” का बिगड़ा रूप है अध्यापक ।) {५. बेच्यूंन = (फा०)बेचून---बे =बिना, नहीं । चून =समान, बराबर । अर्थात् उपमारहित(अद्वैत, असमान)}इस संसार में उद्भट विद्वानों से बड़े-बड़े ज्ञानियों ने बहुत कुछ पढ़ालिखा; परन्तु उस निरुपम(अद्वितीय) ब्रह्म के विषय में उनमें से भी कोई कुछ कह-सुन नहीं सका; क्योंकि उसका वर्णन तो ‘नेति नेति’ से ही हो पाता है ॥९॥ (क्रमशः)
*= छन्द =*
*उस नूर तैं सब नूर दीसै,*
*तेज तैं सब तेज हैं ।*
*उस जोति सौं सब जोति चमकै,*
*हेज१ सौं सब हेज हैं ॥*
*आफ्ताब अरु महताब तारे,*
*हुकम उसके चाल है२ ।*
*यौं कहत सुन्दर कब्जदुन्दर,*
*अजब ऐसा ख्याल है ॥७॥*
(१. हेज = प्रेम ।) (२. चाल है = चलते हैं ।)
उस तेज से सारा जगत् क्रियावान् है, उसके चैतन्य से सब चेतन हैं । उस ब्रह्मज्योति से समग्र प्रकाशित होता है । उसके प्रेम(प्रसन्न होकर दिये फल) से सब सुखी है । अग्नि, सूर्य, तारे - सभी उसके तेज से चमक रहे है । सब उसकी आज्ञा से चलते- फिरते(क्रियावान्) हैं । (परन्तु) इन्द्रियनिग्रह के बिना उस आश्चर्यमय तेज तक कैसे पहुँचा जा सकता है ! ॥७॥
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*= दोहा =*
*सुन्दर आलिम३ इलम सब, खूब पढ्या आंखूंन४ ।*
*परि उसकौं क्यौं कहि सकै, जो कहिये बेच्यूंन५ ॥९॥*
(३. आलिम =(अ०)विद्वान, ज्ञानी ।)
(४. आषून =(फा०)“आखुबन्द” का बिगड़ा रूप है अध्यापक ।)
{५. बेच्यूंन = (फा०)बेचून---बे =बिना, नहीं । चून =समान, बराबर । अर्थात् उपमारहित(अद्वैत, असमान)}
इस संसार में उद्भट विद्वानों से बड़े-बड़े ज्ञानियों ने बहुत कुछ पढ़ालिखा; परन्तु उस निरुपम(अद्वितीय) ब्रह्म के विषय में उनमें से भी कोई कुछ कह-सुन नहीं सका; क्योंकि उसका वर्णन तो ‘नेति नेति’ से ही हो पाता है ॥९॥
(क्रमशः)

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