शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

विरक्त का अंग १५(४६-९)

卐 सत्यराम सा 卐
*निराधार निज राम रस, को साधु पीवनहार ।*
*निराधार निर्मल रहै, दादू ज्ञान विचार ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५*
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भेड न चाटे भेड को, सुख दुख ह्वै भय भीत । 
रज्जब तैसी ठौर तज, ले पशु की रस रीत ॥४६॥ 
भेड़ भेड़ को नहीं, चाटती, कारण, उनकी ऊन में काँटे रहते हैं । अत: चाटने वाली भेड़ को सुख के स्थान में दुख ही मिलता है । ऐसे ही जिस स्थान में विरक्त को अपने साधन में विध्न रूप दु:ख हो, उस स्थान को उक्त पशु की रीति के अनुसार त्यागकर भजन-रस का पान करना चाहिये । 
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रज्जब चाटे भेड सुत, जब लग शुद्ध शरीर । 
भुरट भुंड भरि आवतों, मुख मेलै१ नहिं वीर ॥४७॥ 
भेड़ अपने बच्चे को तब तक चाटती है, जब तक उसका शरीर शुद्ध रहता है, फिर जब उसकी ऊन में भुरटादि काँटे फँस जाते हैं तब हे भाई ! उस पर चाटने के लिये अपना मुख नहीं रखती१ । वैसे ही विरक्त के लिये सदोष व्यक्ति का त्याग ही श्रेष्ठ है । 
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तन मन त्रिगुणी त्याग कर, आतम अनमनि लाग । 
सो रज्जब रामहि मिलैं, घट पट अन्तर भाग ॥४८॥ 
तन अध्यास मन के मनोरथ और त्रिगुणात्मिक माया को त्यागकर जो जीवात्मा समाधि में लगा रहता है, उसके अन्त:करण का अज्ञान रूप वस्त्र का परदा दूर हो जाता है और वह राम से मिल जाता है । 
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ध्रुव अनाथ व्है नीकस्या, तब से सरे सब काज । 
रजजब पाया प्राण ने, धरे१ अधर२ का राज ॥४९॥ 
ध्रुव बालक जब माता-पिता आदि का आश्रय त्याग के, अपने को अनाथ समझकर, विरक्त होकर भगवद् भजन करने के लिये घर से निकला तभी से उसके सभी कार्य सिद्ध होते ही गये और अन्त में उस विरक्त ने मायिक१ राज्य तथा ब्रह्म२ दोनों को ही प्राप्त किया । यही विरक्त की विशेषता है । 

इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित विरक्त का अंग १५ समाप्त । सा. ५७२ ॥
(क्रमशः)

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