🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञान-झूलनाष्टक(ग्रन्थ २६) =*
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*कोई वार कहै कोई पार कहै,*
*उसका कहूँ वार न पार है रे ।*
*कोई मूल कहै कोई डार कहै,*
*उसके कहूँ मूल न डार है रे ॥*
*कोई सून्य१ कहै कोई थूल२ कहै,*
*वह सून्य हुँ थूल निराल है रे ।*
*कोई एक कहै कोई दोई कहै,*
*नहिं सुन्दर द्वन्द लगार है रे ॥३॥*
(१. सून्य = शून्य ।) (२. थूल = स्थूल ।)
कोई उसे सादि(सजन्मा) बताता है, कोई सन्त; कोई अनादि बताता है, कोई अनन्त । कोई इसे सृष्टि का मूल(कर्ता) कहता है, कोई(नैयायिक) इसे स्कन्ध(सहारा = निमित्त मात्र) बताता है । कोई उसे न कर्ता मानता है न स्थूल, न निमित्तमात्र ।
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कोई ज्ञानी(शून्यवादी उसे शून्य कहता है, कोई(वैष्णव आदि) उसे स्थूल(साकार) बताते हैं । दूसरे उसे न शून्य मानते हैं न स्थूल, अपितु उसे निराला(अनिवर्चनीय) ही मानते हैं । कोई(अद्वैतवादी)उसे एक मानते हैं, कोई(द्वैतवादी) उसे दो मानते हैं । वस्तुतः उस परम तत्व का द्वन्द्व कोई सम्बन्ध नहीं है ॥३॥
(क्रमशः)

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