सोमवार, 4 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/१०६-८)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐

*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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दादू राम न छाड़िये, गहिला तज सँसार ।
साधू संगति शोध ले, कुसंगति संग निवार ॥१०६॥
हे बावरे प्राणी ! साँसारिक प्रीति को त्याग दे किन्तु राम - नाम चिन्तन को कभी मत त्याग । कुसंगति और साधारण मनुष्यों के संग को त्याग कर सँतों की संगति द्वारा अपने स्वरूप की खोज कर ।
दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ ।
सजन स्नेही बान्धवा, भावै आपा होइ ॥१०७॥
माता, पिता, बान्धव, कुल, जाति, प्रेम, मित्रादिक का संग यदि बुरा हो तो त्याग देना चाहिए और चाहे अपने ही क्रोधादिक अवगुण हों, उन सबको को भी त्याग देना चाहिए ।
अज्ञान मूर्ख हितकारी, सज्जन: समो रिपु: ।
ज्ञात्वा त्यजँति ते, निरामयी मनोजित: ॥१०८॥
आत्म - ज्ञान तथा व्यावहारिक ज्ञान से शून्य मूर्ख यदि शुभ - चिन्तक मित्र भी हो तो भी उसको शत्रु के समान जान कर त्यागते हैं, वे ही मन को जीत कर जन्म - मरण - रोग से मुक्त होते हैं ।
(क्रमशः)

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